Negative Attitude

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Wednesday, June 5, 2013

चंद शब्द-ऐंवे ही...जारी है!

प्रयास...प्रायः आस...शब्द बनाने वाले की सोच और समझ के पीछे कोई दैविक शक्ति जरुर होगी...हमें ऐसा लगता है पता नहीं आपको लगता है की नहीं? प्रयास करते रहने का मतलब यह नहीं की सभी व्यक्ति अपनी सोच के मुताबिक सफल हो जाएँ लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं की हम प्रयास करें ही ना...प्रयास एक मार्ग है जिस पर आप चलकर ही प्रायः आस कर सकते है। प्रयास मार्ग के जरिये ही आपके प्रायः आस की सफलता की परिभाषा और समझ बहुत मायने रखती है...आपके सोच के मुताबिक सफलता और आपकी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम सफलता की समझ में ना ही आपको प्रयास मदद कर सकती है और ना ही प्रायः आस...इसका वास्तुकार आपको खुद ही बनना पड़ेगा। मनुष्य के प्रजनन प्रणाली का प्रत्येक शुक्राणु जीवन प्राप्त करने योग्य है और लाखों की तादाद में शुक्राणु जीवन प्राप्त करने की एक साथ रेस लगाते है परन्तु कुछ ही जीवन में तब्दील हो पाते है। ये प्रकृति है,विधि का विधान है की प्रयास में हर कोई सफल नहीं होता और यह भी सत्य है की सफलता का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार का डायलाग ही नहीं है। अब ये मत पूछिए की दीवार का डायलाग क्या था...जानने का प्रयास कीजिये इसमें आपको सफलता जरुर मिलेगी!! चलिए बता ही देते है ..मेरे पास गाडी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है.तुम्हारे पास क्या है? अब आप इस डायलाग को पूरा करें:)

प्रयास...प्रायः आस...साथ साथ आपके लिए सफलता के क्या मायने है इसको आपको ही परिभाषित करना होगा और तभी सफलता के साथ संतुष्टि को समायोजित कर जीवन जीने की प्रक्रिया को गतिशील रखा जा सकता है। सत्य तो यह है की इस धरातल का प्रत्येक इंसान मरने के लिए ही जीता है। लोग शादी करते है मुख्यरूप से बुढ़ापे के लिए,लोग बच्चे पैदा करते है मुख्यरूप से बुढ़ापे के लिए,लोग बचत करते है मुख्यरूप से बुढ़ापे के लिए इत्यादि इत्यादि...क्यों?...ताकि उनकी मौत किसी के लिए बोझ न हो...ताकि वे शुकून से इस दुनिया से रुखसत हो सकें...

अगर मरने के लिए हम सभी जी रहे है तो मौत को इतना तवज्जो क्यों दिया जाये…वजाए इसके जीवन में सफलता के अर्थ को ऐसे परिभाषित करें की जिंदगी और मौत के बीच कोई दुरी न रह सके...

मेरे पास गाडी है, बंगला है,बैंक बैलेंस है वाली सफलता का मंत्र तो आत्म-संतुष्टि से समाज-संतुष्टि में तब्दील मानसिकता है जिसमे इसको हासिल करने की अंधी दौड़ में हर वक़्त पीछे छुट जाने का भय व्याप्त रहता है… सफलता को परिभाषित करने से पहले जीवन की जरूरतें,प्रयास और फिर प्रायः आस के समीकरण को समझना ज्यादा जरुरी है और तभी एक सफल सोच का निर्माण हो पायेगा ...सफलता तो इसके बाद आती है!!!

जीवन को क्रियाशील बनाये रखती है हमारी प्रयास...प्रायः आस...निरंतर आस ना की निराश...निराश हुए तो न जिंदगी साथ देती है और न ही मौत ???

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