Negative Attitude

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Wednesday, September 19, 2012

मैन बनाम मैम-पार्ट-I

आज समूचे भारतवर्ष में डीजल,LPG और FDI के मुद्दे पर बबाल मचा हुआ है.ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो टी-२० क्रिकेट वर्ल्ड कप के तर्ज पर भारतीय राजनीती की भी अंतर्देशीय टी-२० प्रतियोगिता चल रही है.इस टी-२० प्रतियोगिता में दो टीम है और उनका नाम Man और Mam हैं,इस प्रतियोगिता की पुरस्कार राशि डीजल,LPG और FDI Trophy है. INDIA इडेन गार्डेन स्टेडियम दोनों टीम Man और Mam के खिताबी जंग का गवाह बनने से गौरवान्वित है.स्त्रीलिंग M ने पहले क्षेत्ररक्षण करते हुए पुलिंग M की मजबुत बल्लेवाजी के बाबजूद सस्ते में सीमित कर रखा है.परन्तु क्रिकेट को अनिस्श्चित्ताओं का खेल माना जाता है.कब कौन किस पे भारी हो जाए किसी को पता नहीं होता.पुलिंग M आर्थिक सुधारों से सम्बंधित महत्वाकांक्षी फैसलों और स्पिनर्स के कई विकल्पों के साथ उसके हौसले बुलंद है.पुलिंग M POWER PLAY के इस्तेमाल में भी माहिर है.इन्हें बखूबी पता है की POWER PLAY के दौरान उताबलेपन में स्पिनर्स का इस्तेमाल कैसे करना है.स्त्रीलिंग M को शुरूआती झटको से भले ही डर ना हो परन्तु टी-२० मुकाबलों में २-3 विकेट जल्दी गिर जाए या २-३ ओवर धीमा चला जाए तो मैच की बाजी पलटते देर नहीं लगती.दोनो टीम Man एवं Mam अपनी कार्यकुशलता के लिए विख्यात है और 50 -50 फॉर्मेट में दमदार टीम मानी जाती है.स्त्रीलिंग M नें हाल ही में 33-34 साल पुरानी वाम दल को शिकस्त दे क्षेत्रीय टूर्नामेंट - बंगाल बागान ट्राफी जीत अतिउत्साहित है,वही दूसरी तरफ पुलिंग M लगातार दो बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता Parliamentary Election Cup जीतने के अनुभव से गौरवान्वित है लेकिन टी-२० फॉर्मेट बिलकुल अलग होता है,इसमें दांवपेच और निर्णय की गति कितनी तीब्र और सटीक है,यही जीत और हार दोनों की दिशा एवं दशा निर्धारित करती है.दूसरी पारी का खेल शुक्रवार को जुम्मे की नमाज़ अदा करने के ठीक बाद शुरू होगी.

INDIA इडेन गार्डेन स्टेडियम लगभग १२१ करोड़ दर्शको से खचा खच भरा हुआ है और इनका उत्साह देखते नहीं बन रहा है.अपनी अपनी टीम का हौसला अफजाई करने के लिए कोई अपने सर पर LPG गैस सिलिंडर का टैटू,कोई FDI का बैनर तो कोई पेट्रोल पम्प मुद्रित छवि वाला टोपी पहन रखा है.आशा करता हूँ रोमांच के इस चरम को देखकर अब आप भी रोमांचित हो गये होंगे. आजादी के वक़्त लोकतंत्र के पैरवीकार और संविधान की रचयिता मंडली सपनों में भी नहीं सोची होगी की भारतीय राजनीती इतनी पेशेवर हो जायेगी.आम आदमी की जरूरतों की राजनीती की वजाए राजनितिक मजबूरी की राजनीती होने लगेगी.सत्ता पक्ष की मुगलिया शासन शैली मान विपक्षी पार्टियां डीजल,LPG और FDI के निर्णय को स्वीकार नहीं करना चाहती वही सत्ता पक्ष विपक्ष को हठी मान सत्ता गंवाने का जोखिम उठाने को तैयार है.कौन कितना सही है ये तो आने वाला समय की बतायेगा लेकिन निर्वाचक मानी जाने वाली देश की लगभग १२१ करोड़ जनता अगर दर्शक बनने को मजबूर हो जाए तो निश्चित तौर पर प्रजातंत्र की संकल्पना में ही कोई त्रुटी है.

गंभीर प्राणनाशक रोगों की आधुनिक एवं उन्नत औषधियां रोग की पीड़ा से तुरंत आराम दिलाती तो जरूर है परन्तु इसमें भी पीड़ादायक SIDE EFFECTS होते है.65 साल पुराना रोग देश की घातक आर्थिक विषमताओं
के उपचार के SIDE EFFECTS से डरकर क्या टेस्ट क्रिकेट खेलते रहना ही अच्छा होगा या डीजल,LPG और FDI जैसे मुद्दों पे टी-२० के तर्ज पर बोल्ड एवं महत्वाकांक्षी फैसले लेकर? आज जिस जिस राज्य में राजनितिक पार्टियां जनता को सत्ता परिवर्तन के फायदा नुकसान का पाठ पढा सत्ता हासिल किया उन्ही राज्यों की सरकारें परिवर्तन की सकारात्मक परिणाम दिखाने में नाकामी का सारा ठीकरा डीजल,LPG और FDI जैसे मुद्दों के जरिये Man के सर फोड़ ये टी-२० डीजल,LPG और FDI ट्राफी जीतना चाहती है.अभी वक़्त एक व्यक्तिगत break का है.कहीं जाइएगा मत,Man बनाम Mam के खिताबी मुकाबले की दूसरी पारी का सूरत-ऐ-हाल  के साथ जल्द वापस लौटते है.मित्रों आज श्री गणेश चतुर्थी है और आज से लगातार दस दिन तक पूरा देश हर्षोल्लास में डूबा रहने वाला है.श्री जी के आगमन पर आप सबको श्री गणेश चतुर्थी की शुभ कामनाएं...गणपति बाप्पा मोरया..:-)

Monday, September 17, 2012

रेडियो और रेडियो जॉकी

मीडिया आज भारतीय समाज के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है.सूचना,शिक्षा तथा मनोरंजन के क्षेत्र में मीडिया का योगदान अतुलनीय है.आज पूरे संसार को जो वसुधैव कुटुम्बकम का स्वरुप प्रदान किया है वह मीडिया की ही देन है.मीडिया हमें नवीनतम घटनाओं के बारे में हमारे ज्ञान के अद्यतन के द्वारा समाज,देश एवं पुरे विश्व से जोड़कर रखता है.आज मीडिया(समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन और इन्टरनेट) हमारे जीवन की एक आवश्यकता बन गयी है.रेडियो भी टेलीविजन,समाचार पत्र,पत्रिका और आज के आधुनिक दौर में इंटरनेट के तरह ही जन संचार का ससक्त माध्यम है.दोस्तों हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता संग्राम से भी रेडियो का खासा लगाव रहा है.नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने लगभग ७० वर्ष पहले रेडियो आजाद हिंद की स्थापना की थी जो स्वतंत्रता की लड़ाई में एक सेनानी की तरह भूमिका अदा किया था.मैं यह जानकार बहुत हर्षित हुआ की हाल ही में मध्य प्रदेश में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की याद में आजाद हिंद नामक एक रेडियो स्टेशन का श्री गणेश किया गया है.यह निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है ताकि स्वतंत्रता का जज्बा हमारे रक्त में निरंतर प्रवाहित होती रहे.हमारा देश पिछले पंद्रह बीस वर्षों में प्रसारण उद्योग के तेजी से विकास को देखा है और यह प्रवृत्ति अंतर्राष्ट्रीय समुदायों द्वारा वैश्वीकरण विशेष रूप से उदारीकरण,निजीकरण और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था पर दिए जा रहे बड़े पैमाने पर बल का परिणाम है.प्रसारण उद्योग में एयर वेव्स (Airwaves) के उदारीकरण के बाद,हमारे देश में भी अन्य मीडिया जैसे टेलीविजन के तर्ज़ पर रेडियो प्रसारण के भी सरकारी एकाधिकार हटा दिए गए और परिणामस्वरूप आज एफ एम रेडियो एक मनोरंजन क्रांति का रूप धारण कर चुकी है.एफ एम रेडियो रेडियो का ही एक स्थानीयकृत भाग है जिसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय होकर संगीत और अन्य रेडियो कार्यक्रमों के द्वारा मनोरंजित करने के आलावा नवीनतम घटनाओं के बारे में भी हमारे ज्ञान के अद्यतन में मदद करना है.

हमारे देश की स्थिति किसी से भी छुपी हुई नहीं है.गरीबी,निरक्षरता,कुपोषण,बेरोजगारी एवं भ्रूण हत्या जैसी गंभीर समस्या हमारे देश में विकास की बाधक बनी हुई है.मेरा मानना है की रेडियो खासकर कम्युनिटी रेडियो इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है,शहरो से थोडा सुदूर जाकर,ग्रामीण इलाको में लोगो को मनोरंजित करने के साथ साथ ज्ञान के पिटारे के रूप में उनके जीवन का अभिन्न अंग बनकर.कम्युनिटी रेडियो के लिए सरकारी नियम क्या है,मुझे इस बाबत इतनी पुख्ता जानकारी नहीं है परन्तु यह मैं अवश्य जानता हूँ की कम्युनिटी रेडियो की प्रक्रिया व्यावसायिक दृष्टिकोण से थोडा जटिल है.अगर आप सभी रेडियो समुदाय एकजुट होकर इस सन्दर्भ में कोई मुहीम चलाये,क्या पता रेडियो के माध्यम से जनकल्याण की कोई क्रांति जाग्रीत हो जाए और ग्रामीण एवं पिछड़े लोगो को अज्ञानता के रोग से मुक्ति दिला सके,ये अपने हक के प्रति जागरूक हो सके.अगर यह सफलतापूर्वक असरकारक बन पाया तो हमारे देश की तरक्की के लिए इतिहास में रेडियो का यह कार्य भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो जाएगा.

आइये अब मनोरंजन क्रांति की चर्चा में थोडा गति प्रदान करते है.एफ एम रेडियो और इसका स्थानीयकरण यानी स्थानीय होते हुए वैश्विक बने रहना वह भी सिर्फ एक जरिया गीत,संगीत के बलबूते कम चुनौती भरा नहीं है.किसी भी रेडियो स्टेशन के लिए श्रोताओं को मनोरंजित करना और अपने साथ बांधकर रखना बहुत ही कठिन कार्य होता है और इस महत्वपूर्ण एवं चुनौतीपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी रेडियो जॉकी (Radio Jockey-RJ) के ऊपर होती है.रेडियो जॉकी (Radio Jockey-RJ) जो एक रेडियो टॉक शो होस्ट करता है जहाँ वह श्रोताओं के साथ बातचीत करते हुए श्रोताओं के लिए संगीत या किसी भी प्रकार की चर्चा का विषय चयन करता है.रेडियो जॉकी (Radio Jockey-RJ) द्वारा श्रोताओं को मनोरंजित करने की उत्कंठा,धुन उनके कार्य के प्रति अथाह समर्पण का प्रतिक है.हम सभी को कार्य के प्रति इनके जज्बे से प्रेरणा लेनी चाहिए.आवाज़ की कलात्मकता के साथ साथ अपने शो को जीवंत और दिलचस्प बनाना,चाहे वो हास्य या विनोद के जरिये हो या फिर सामाजिक विषयों पर शास्रार्थ कर ये सिर्फ और सिर्फ रेडियो जॉकी (Radio Jockey-RJ) ही कर सकते है.इनकी बातों के साथ संगीत और भी संगीतमय हो जाती है,रेडियो प्रेमिका बन जाती है,मगरीब क्रीड़ा करने लगती है और निशा वश में नहीं रह जाती.श्रोताओं के सबसे करीब होने की प्रतियोगिता में कोई सबसे फ़िल्मी बना है,कोई हॉट है तो कोई बजाते रहने का प्रण ले रखा है,कोई पुरानी जींस,कोई कल भी आज भी,कोई सनसेट समोसा,कोई टकाटक मुंबई, कोई हाय मुंबई,कोई धीमी लोकल,कोई यादों का इडीअट बॉक्स,कोई रोमांटिक आफ्टरनून,कोई लव गुरु तो कोई मुंबई का भाई -RJ के साथ मनोरंजन के इतने सारे चेहरे - जो भी हो इनकी प्रतियोगिता में जीत रचनात्मकता की होती है,जीत कौशल की होती है और रचनात्मकता,कौशल एवं प्रतिभा के जरिये लड़ने की इस चाह से श्रोताओं के लिए मनोरंजन किसी उपहार से कम नहीं लगता.फिर भी हमारे देश इनके कार्य को निरंतर प्रोत्साहित करने के लिए कोई व्यवस्थित मंच नहीं बन पाया है.

खैर निराश होने की कोई बात नहीं है,आज एक श्रोता इनके कार्य के प्रोत्साहन में इनको मनोरंजित करने का प्रयास कर रहा है,शायद इनको पसंद आये..... RJ जीतुराज जब आप अपने साथी RJ को अभद्रता और जिम्मेदारी पर ज्ञान दे रहे होते है तो उस समय स्थिति बहुत विचित्र हो जाती है कारण यह है की आपका ज्ञान दान समाप्त होते ही श्रोताओं के लिए आप हलकट जवानी प्ले कर देते है.पता नहीं आप क्या सन्देश देना चाहते है -जिम्मेदारी से अभद्रता या भद्रता के साथ अभद्रता-शायाद आप EEE फ़ॉर्मूला के कट्टर अनुयायी है...RJ अनमोल हॉट है - गोल्डेन इरा के एक गीत (ये जो चिलमन है दुश्मन है हमारी बड़ी शर्मीली,बड़ी शर्मीली दुल्हन है हमारी.दूसरा और कोई यहाँ क्यूँ रहे दूसरा और कोई यहाँ क्यूँ रहे हुस्न और इश्क़ के दरमियां क्यूँ रहे) के साथ आपसे फिलहाल संवाद समाप्त करता हूँ.RJ सुरेन & मीं मीरा,आपके वृथा वकबाद और चयनित संगीत के समावेश से सनसेट समोसा बहुत स्वादिष्ट बन जाता है, लगे रहिये.RJ यासीर - आप यूँ ही फ़िल्मी स्टाइल में दिमाग की दही करते रहे,श्रोताओ को मग मिले या नहीं,सब चलेगा.RJ संगीता,90's और early 2000 के गाने इतने भी बुरे नहीं है की लोकल धीमी चले,वल्कि इसके विपरीत तुम्हारे द्वारा चयनित गानों के साथ औसत गति से भी ज्यादा तीव्र हो जाती है मुंबई लोकल...RJ रोहित वीर,चंद्रकांत चिटनिस का email फाडू होता है मेरे दोस्त..जो भी हो ह्यूमर के साथ टयूमर...शाम के वक़्त परफेक्ट लाफ्टर थेरापी और क्या चाहिए ...RJ लव गुरु..क्यों लोगो को गुमराह कर रहे हो यार..RJ गुरु बन जाए तो RJ-ism की अस्तित्व खतरे में पड़ सकती है...Cool ..RJ पन्ना,आपके निर्देश पे बत्तियां बुझाने जा रहा हूँ...आपके लिए जो गाना है...प्ले कर दूं...पक्का...तो ये लो...(दो बातें हो सकती हैं,सनम तेरे इनकार की,या दुनिया से तू डरती है,या कदर नहीं मेरे प्यार की)...बत्तियां बुझी रहनी चाहिए पन्ना..RJ's की बड़ी लम्बी सूचि है,मेरे इस लेख में सबो का जिक्र भले ही न हो पर मोहब्बत बरकरार है... आपके सभी के अच्छे एवं निष्ठापूर्वक कार्य ने MURPHY को बर्फी के रूप में पुनः जीवित कर दिया...धन्यवाद,धन्यवाद और धन्यवाद...Keep up the good work...:-)

Monday, September 10, 2012

पॉवर ऑफ सिडक्शन - अमिताभ बच्चन

ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है.....जोदि त्होर डाक शूने कोई ना आशी तोबे एकला चोलो रे,तोबे एकला चोलो,एकला चोलो,एकला चोलो,एकला चोलो के उद्घोष के साथ पंच कोटि ज्ञान कुम्भ कौन बनेगा करोड़पति 6(2012) का शानदार आगाज़ हुआ.घड़ियाल बाबु से श्रीमती टिकटिकी और अब उनकी संतान सुई मुई पंच कोटि ज्ञान कुम्भ कौन बनेगा करोड़पति 6 (2012 ) में समय के नियंत्रण की कमान संभालेगी.जिस तरह समय परिवर्तनशील है ठीक उसी तरह समय को नियंत्रित करनेवाला भी-वाह!-इस कार्यक्रम की रचनात्मकता में मानव जीवन की छोटी छोटी परन्तु बुनियादी संदेशो का समावेश इस शो को अद्भुत बनाता  है.

आम आदमी से दूर होकर भी उनसे जुड़ कर, उनके बीच बातचीत,बहस - मुबाहिसा,विचार - विमर्श एवं मनोरंजन करते हुए ज्ञान का यह खेल और वह भी सदी के महानायक  की मेजबानी में शो को लोकप्रिय तो बनाता ही है साथ साथ ज्ञान के साथ मनोरंजन का इस्तेमाल इसको एक अति विशिष्ट कार्यक्रम की फेहरिस्त में शुमार करता है.अमिताभ बच्चन की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति,भाषाओ की शुद्धता,अभिनन्दन की व्यावहारिकता और लोगो को उनके ही भाषाओ में संवाद उनके शख्शियत के साथ साथ इस शो को समस्त संसार में अतिरिक्त प्रसिद्धी तथा सम्मान प्राप्त कराता है.इस धरातल पर महिलाओं की प्रलोभन शक्ति सबसे ससक्त मानी जाता है परन्तु मनोविज्ञान अगर इस सिद्धांत से निश्चिंत हो चुका है तो मनोवैज्ञानिक इस ७० वर्षीय अमिताभ बच्चन के KBC के एक दो प्रकरण देखे,आपको यह शो Seduction Power के सिद्धांत को फिर से परिभाषित करने को मजबूर अवश्य करेगी. 

प्रणाम,कही जाइएगा मत,Let us play,शुभ रात्रि,अनेक अनेक धन्यवाद जैसे संबोधन एवं शो में पूछे गए सवालों में Item Numbers की मौजूदगी के साथ अमिताभ बच्चन की जादुई आवाज़ - मानों स्वर्ग की अप्सराएं सूर्य को बंधक बना पूरी पृथ्वी को रिझा रहीं हो.मनोरंजन उद्योग की Theory चाहे कुछ भी कहे लेकिन एक बात तो स्पष्ट है की Seduction सिर्फ बोल्ड एंड ब्यूटिफुल का मोहताज नहीं है.आज मनोरंजन उद्योग जगत में TRP के युद्ध का एक कारण यह भी है की ये जरूरत से ज्यादा लोगो को मनोरंजीत करना चाहते है.भारत की साक्षरता,संस्कृति,लोगो की आर्थिक स्थिति,भाषा का मोह एवं परंपरा की गुलामी इस देश को विचित्र बनाता है और इस विचित्रता भरे देश में मनोरंजन की अत्यधिकता वह भी निर्धारित प्रारूप के साथ,स्त्री के प्रलोभन शक्ति पे बेइन्तेहाँ निर्भरता टेलीविज़न मनोरंजन को दिन ब़ा दिन उबाऊ बनाता जा रहा है.अब मनोरंजन उद्योग उद्देश्य पे कम TRP की अधिकता पे ज्यादा ध्यान केन्द्रित कर रहा है.KBC की रचनात्मकता,प्रारूप को देखकर सीख लेनी चाहिए जो हर बार एक नया अवतार और एक नयी कटिबद्धता के साथ प्रतियोगियों में भी विविधता प्रस्तुत करता है.टेलीविजन समाचार,मनोरंजन के स्रोत के साथ साथ जनता की राय गढ़ने का भी एक शक्तिशाली माध्यम है और अगर इसका इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए तो विशालकाय TRP स्वयं ही स्थापित हो जायेगी.

Entertainment,Entertainment,Entertainment का फ़ॉर्मूला सिर्फ क्षणिक मनोरंजन के लिए कारगर सिद्ध हो सकती है,परन्तु विशालकाय TRP स्थापित नहीं कर सकती.विशालकाय TRP स्थापित करने के लिए Edu-tainment,Info-tainment एवं Fami-tainment फ़ॉर्मूला अपनाना होगा जिससे लोगो की नजरों में टेलीविजन के माध्यम से मनोरंजन के प्रति एक सकारात्मक सोच तैयार तो होगी ही साथ साथ हमारे देश के दूर दराज़ इलाको में जहाँ शिक्षा के बहुत सिमित विकल्प है,वहाँ विविधताओ से भरे इस प्रकार के कार्यक्रम आम लोगो के जीवन की बुनियादी अवश्यक्ताओ का हिस्सा बनने में भी कामयाब होगा.टेलीविजन को आम लोगों से जोड़ने के प्रयास के वजाए आम लोग टेलीविजन से कैसे जुड़े,इस पर सोचने की जरूरत है और अगर यह संभव हो पाया तो फिर TRP क्या है,यह खुद ब़ा खुद टेलीविजन कार्यक्रमों के कदम चुमेंगी... अमिताभ बच्चन जी आप अद्वितीय है...:-)


[*Edu - Education,Info - Information,Fami - Family
* टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स - टीआरपी (TRP) एक कसौटी है जो एक चैनल या कार्यक्रम की लोकप्रियता इंगित करती है]

Sunday, September 9, 2012

SUNDAY...खुशामदीद..:-)

रात भी इस ब्रह्माण्ड को चलाने में उजाले के बराबर योगदान देता है.रात एक नए दिन के शुरुआत,एक नई रौशनी की मार्गदर्शक है.रात समय की वह गति है जो हमारे जीवन में सूर्य,उजाले  की सीमित आकांक्षा को प्रमाणित करता है.रौशनी के दिए हुए जख्मो को आराम प्रदान करता है ताकि फिर से हम दुबारा इसके द्वारा दिए जाने वाले जख्म का सामना कर सके.रात हमें सपने दिखता है ताकि जिंदगी से जुडी आशाओं की गतिवृद्धि हो सके.रात हमारे शरीर के खर्च हुए उर्जा को समायोजित कर पुनः ताजादम करता है.रात उजाले की ख़्वाहिश,चाहत का संरक्षण करता है ताकि हमारी रौशनी से मोहब्बत कभी कम न हो सके.अँधेरे में रौशनी रौशनी नहीं वल्कि इसकी जीवन संगिनी लगती है.रात के अँधेरे में ही सितारे की रौशनी चकाचौंध लगती है,उजाले सितारों की चमक,सितारों की उंचाई क्या जाने? अँधेरे में रौशनी की चमक के साथ रात और भी मादक हो जाती है जैसे की उजाले के थकान के नशे में मदहोश हमारा शरीर रात के आगोश में लिपट जाने को आतुर होता है.रात शुन्य का परिचायक है जो हमें आगे,तेज भागने और भागते रहने का सन्देश देता है.रात रौशनी का अस्थायी का अंत है जैसे दिन रात का,अंधकार का.जीवन की हर एक रात बीता हुआ पल है वही हर एक दिन एक नया जीवन,एक नयी आशा,एक नया प्रोत्साहन है,एक नयी तस्वीर है,एक नया संघर्ष,एक नयी उपलब्धि है.दिन कोरा कागज है तो रात स्याही.दिन एक लेख है तो रात एक लेखक.दिन अगर गुमान है तो रात एक ईमान है.फूल रातों में भी खिलते है उजालो की शक्ल में,कही नाम रात रानी तो नहीं!!!!

A very good morning SUNDAY...खुशामदीद..:-)

Thursday, September 6, 2012

वक़्त हर जख्म को मिटा देती है,क्या यह सत्य है?

लोग अक्सर कहा करते है की वक़्त हर जख्म को मिटा देती है, क्या यह सत्य है? क्यों है वक़्त पे इतना यकीं? बीते हुए यादों की कड़वाहट,पुराने जख्मों के निशां एवं छुपे एहसास खराश बनकर क्या जख्मों के टीस को पुनः जवां नहीं कर देती.ये तो मुस्कराहट है जो बीते को बीता समझ इन जख्मों से दूरियाँ बनाने की कोशिश करती है.ज़ख्मों की नाप तौल करते होंठो पे बलखाते ये मुसकुराहट,खर्च हुए साँसों की कीमत अदा कर रही होती है.
उलझनें उलझन से कह रहीं होतीं है की जख्म भले ही जख्म हों रहती तो ये साथ हैं,ख़राशों का क्या, इसके ज्वार न जाने कब आये और इन जख्मो को पुनः जख्मी कर कर लुप्त हो जाए.जख्म और ख़राशों के इस द्वन्द्व युद्ध से दहसतजुदा मुस्कराहट जीवन के कलरव के बीच मुस्कुराने के लिए परिस्थितियों की दासी हों जाती है.अच्छे दिखने की मुसकुराहट,अच्छे बनने की मुसकुराहट,मुसकुराहट के मन के विरुद्ध मुस्कराहट,मन के ज्वाला की मुसकुराहट,मुसकुराहट छिनने की मुसकुराहट,आमोद प्रमोद की मुसकुराहट,अहंकार की मुसकुराहट-बस वजहों के कैद हों कर रह जाती है मुसकुराहट या यूँ कहें खुशियाँ बिना वजह के मुस्कान नहीं बन सकती.खुशियों और मुस्कान के इन्ही वजहों की खोज में हम मनुष्य आज जीवन प्रबंधन के अध्यन में जुटे है.जीवन की उलझनों को और उलझाने लगे है.पारदर्शिता से परे उलझनों को पैतरे और कलाबाजियों से सुलझाने में लगे है.खुशियों को बेवजह खुश करने में लगे है.जख्म एवं ख़राशों की पारदर्शी कार्यशैली ही इनके टीस को विशुद्ध बनाती है ठीक इसी तरह मुसकुराहट की पारदर्शिता मुस्कुराकर ही महसूस की जा सकती है.जब कोई भी नवजात जीवन क्रियाशील होता है तब रोता है परन्तु उसके आगमन एवं क्रियाशील होने के उल्लास में हम तमाम लोग हर्षित होते है,उत्सन मनाते है.एक वक़्त ऐसा भी होता है जब रोने की दिखावटी भावाभिव्यक्ति रोते हुए नवजात जीवन को हँसा देती है.रोने और हँसने की अभियांत्रिकी बिलकुल स्पष्ट है.वजह अगर मृगतृष्णा बन जाए तो जख्म और खराशें टीस देतीं रहेंगी लेकिन एक जीवन के क्रियाशील होने की क्रिया एवं प्रतिक्रिया के विशुद्ध एवं पारदर्शी भाव खुशियों की स्वागत करती ख़ुशी पे गौर करे तो मन में ये प्रश्न बार बार उठता है की हम मुस्कुराना चाहते है या सिर्फ परिस्थितयों के आगोश में ही मुस्कुराना चाहते है क्योंकी हमारे जीवन में जख्म भी होंगी,अज्ञात खराशें भी होंगी,सोचना यह है की वजहों से लैस मुस्कुराहटों से जख्म और ख़राशों का अंतर समझना है या मुस्कुराहटें वजहों के मिजाज समझने में स्वयं सक्षम है यह मानते हुए इस उहापोह का समाधान इनके ही ऊपर छोड़ देना है.जहाँ तक जीवन प्रबंधन की सूत्र तलाशने की बात है यह वाक्य जख्म भले ही जख्म हों रहती तो ये साथ हैं,ख़राशों का क्या,इसके ज्वार न जाने कब आये और इन जख्मो को पुनः जख्मी कर कर लुप्त हो जाए जीवन प्रबंधन की गहराई समझने के लिये पर्याप्त है.मानव जीवन बिलकुल सहज है और सहजता के लिये प्रबंधन का कोई स्थान नहीं होता.जख्म तो जख्म हैं टीस तो उठेगी ही पर इसको नियंत्रित करने की एक ही औषधि है मुस्कुराना,मुस्कुराते रहना वह भी वजहों से आज़ाद होकर.So ,Smile,even if it's a sad smile,because sadder than a sad smile is the sadness of not knowing how to smile...:-)

Sunday, September 2, 2012

परिणाम जो भी हो आघात भारतीयता होगी,शर्मशार भारतीयता होगी.....

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख श्री राज ठाकरे ने बिहारीओं को घुसपैठियें मान पहले तो उनको महाराष्ट्र से खदेड़ने की धमकी दी और फिर अब हिंदी चैनलों को बंद करवाने की धमकी दे रहे है.हिंदी भाषा से कम पर हिन्दीभाषी लोगो के साथ इनका अच्छा खासा लगाव रहा है या यूँ माने की हिन्दीभाषी लोगो के खिलाफ आग उगलना इनकी सफलता का महामंत्र है,इनकी सफलता की कुंजी है.महाराष्ट्र और मुंबई के विकास की धीमी गति,लचर एवं असुरक्षित होती प्रशासनिक व्यवस्था की कोई राजनेता या राजनितिक पार्टियाँ जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती परन्तु लाल बत्ती से रौशन राजनितिक जीवन में अपनी मौजूदगी और प्रभाव का एहसास प्रत्येक राजनेता या राजनितिक पार्टियाँ कराती रहनी चाहती है.अपने जनता को उनके ही मौलिक मुद्दों से ध्यान दिग्भ्रमित कराने के लिए महाराष्ट्र की राजनितिक पार्टियां समय समय पर हिन्दीभाषी लोगो के खिलाफ आग उगलने की वयानबाजी जैसी मसालेदार और चटपटी राजनीती करती रहती है.आजाद मैदान की घटना के बाद उमड़े इनके महाराष्ट्र प्रेम का गुबार इनकी क्षीण होती रचनात्मकता वाली राजनीती के लिए एक उत्सव है.अव उत्सव होगी तो जश्न भी होगा और राजनितिक जश्न यानी  वैमनष्य का,एक दुसरे को तोडने का,गुमराह करने का,विशुध कलियुगीया जश्न...हिन्दीभाषी,बिहारी,यु.पी वाले भैया,नॉर्थ इंडियन जैसे शब्द तो राजनीती में भोजन मेज पे परोसने वाले वयंजनो के नाम है और वैमनष्य की वयानबाजी इन वयंजनो को चटकदार बनाने के मील एकम्पनिमेन्ट्स या साइड डिश है.हिन्दुस्तानी संस्कृती में चटपटा खाना,मसालेदार फिल्म,मसालेदार राजनीती की बढती रूचि पूरी सभ्यता को बीमार करती जा रही है.चाहे वो सामाजिक सभ्यता हो या राजनितिक.हर तरफ आईटम की तलाश और आईटम जैसी भावो की प्रस्तुति से लोग अपनी मृत होते रचनात्मकता एक अच्छा परिचय दे रहे है.कर्म और मनोरंजन जीवन की दो विभिन्न आवश्यकताएं है.कर्म को मनोरंजन की शक्ल देना कर्म और मनोरंजन दोनों की गुन्वत्ताओं का अपमान तो है ही साथ साथ इसके साख को बट्टा  लगाना है.इस कुष्ठ सोच की गवाह होती हमारी कोमल एवं जवान पीढियां पता नहीं कर्म के इस गिरते स्तर को किस तरह लेंगे परन्तु यह स्पष्ट है की कोमल पत्तियां समय के थपेड़े,मौसम के सानिध्य में एवं बदलते स्वरुप के साथ ही परिपक्व होती हैं फिर वैमनष्य का यह व्यापक विज्ञापन क्या हमारी कोमल एवं युवा पीढ़ियों की परिपक्वता में एक गभीर विकृति पैदा नहीं करेगी? प्रसासनिक व्यवस्था में राजनितिक हस्तक्षेप, दोनों की कार्यशैली का प्रश्नवाचक उदहारण है,नियमो के पेशेवर तरीके का  इस्तेमाल ही नियमो की गरिमा और लोगो के प्रति इसकी श्रद्धा को बढ़ाएगा न की व्यक्तिगत या राजनितिक भावनाओं के प्रवृत्त हो.वैमनष्य फैलाना एक प्रकार का शोषण है जो न सिर्फ एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह को जहरीला बनाता है वल्कि यह पुरे मानवीय जीवन की श्रृंखलाओं को दूषित कर देता है.हम सब ये क्यों नहीं समझ पाते की विधायिका की राजनीती भी स्वार्थ के लिए होती है अगर यह सत्य नहीं होता तो राष्ट्रपति बनने के लिए राजीनीति पार्टी सहित सभी लाभ के पद को त्याग देना होता है.जब हमारा संबिधान मानता है की लोकतंत्र की राजनीती भी स्वार्थ के लिए होती है,लाभ के लिए होती है तो फिर हम क्यों नहीं समझ पाते, हम क्यों एक राजनितिक इशारे पर एक दुसरे को मरने मारने पे तुल जाते है.एक राजनीतिज्ञ के बातो से प्रवृत्त हो ये क्यों भूल जाते है पहले हम भारतीय है बाद में अपने माता पिता,पैत्रिक स्थान,गृह स्थान या गृह राज्य के.अगर हम भारतीयता को भूल जायेंगे तो देश प्रेम देश प्रेम कैसा? अमर जवान की मूर्तियों पे आघात निस्संदेह निंदनीय है पर मुंबई की अमर जवान पुरे हिन्दुस्तान का अमर जवान है,मुंबई की शान पुरे हिन्दुस्तान की शान है.देश द्रोहियों को दण्डित करना किसी एक राजनेता या राजनितिक पार्टी की जागीरदारी नहीं,यह संबिधान का काम है और हमारा संबिधान देश की रक्षा के प्रति हमसे ज्यादा जिम्मेदार है.हम और आप बोलकर देशप्रेम प्रदर्शित नहीं करते वल्कि इसकी आड़ में भी लाभ के विकल्प तलाशने की कोशिश में लगे रहते है पर हमारा संबिधान बोलता नहीं,करता है! प्रसासनिक व्यवस्था में समन्वय में लापरवाही होगी तो संवाद भी होगा,इसमें गलत क्या है,ये भारत देश के अधिकारी है किसी एक राज्य के नहीं और अपने जिम्मेदारी के अधिकारों का वैधानिक इस्तेमाल करना इनका कर्त्तव्य एवं इनके पदभार करते समय का शपथ भी.राजनितिक हस्तक्षेप की जरूरत है क्या इसमें अगर है तो क्यों? व्यवस्था या सिस्टम पे प्रश्न के वजाय प्रांतवाद एवं जहर फैलाने की राजनीती क्यों? बात निकली है तो उत्पात भी होगा,एक दुसरे से लड़ेंगे भी,किसी का घर वीरान होगा तो किसी की रोजी पे प्रहार.हमारी सरकार इन राजिनितिज्ञों पे लगाम लगाने के वजाए एक नए HELPLINE NO बनाने की कवायद अवश्य शुरू कर दी होगी.आपात स्थिति है भाई.परिणाम जो भी हो आघात भारतीयता होगी,शर्मशार भारतीयता होगी.....

Saturday, September 1, 2012

और फिर जिस्म जिंदगी के रहस्य में जमींदोज़ हो जाता है.....

एक वक़्त होता है जब जिंदगी बहुत आसां लगती है.जिंदगी की हरेक राहें मानों जिंदगी की ओर खिचती चली आती है,जिंदगी की हरेक लम्हें जिंदगी के साथ जश्न में डूबी रहती है.जिंदगी हर वक़्त उड़ने को बेताब रहती है,ऊँचाइयों को छूने के नित नए नए ख्वाबों में डूबी रहती है.जिंदगी को जिस्म मिला होता है और जिस्म को जिंदगी.ऊँचाइयों का ख्वाब,उड़ते रहने का ख्वाब,हर वक़्त उत्सव मानते रहने का ख्वाब ही दोनों की खुशियाँ और जश्न होती है.उत्सव मनाते मनाते इन दोनों को पता नहीं चलता की वक़्त क्या होता है,इसकी गति कितनी तीव्र होती है और यह इस उत्सव की अवधि को अपने आगोश में कितनी तीब्रता से लील लेता है.पर जिंदगी और जिस्म को इनसे क्या लेना.अभी तो ये आमोद कर रहे होते है.उत्सव भरे लम्हें इन्हें एक दुसरे से जुदा होने नहीं देते ,इन्हें ये ज्ञात होने नहीं देते की ये दोनों एक होकर भी एक नहीं है.उम्र की बढती आयु एवं समय की तीब्र परन्तु इसकी नीरव चाल धीरे धीरे इन दोनों के ऊँचाइयों का ख्वाब,उड़ते रहने का ख्वाब पुरे करने का आभास दिलाती है.जिस्म और जिन्दगी अब एक दुसरे से मुड़ने लगते है,दोनो का एक ही मकसद होता है,ख्वाबों को पूरा करने का संघर्ष शुरू करना परन्तु समय की मादक चाल के साथ साथ जिंदगी को जिस्म और जिस्म को जिन्दगी का मोह इन्हें इनसे जुदा करने लगती है.परिवर्तन के गवाह होते ये दोनों एक दुसरे को समझना शुरू करते है परन्तु ये इतना आसां कहाँ? एक दुसरे को समझने और ख्वाब पूरा करने का संघर्ष इनको जवान से बुजुर्ग होने को मजबूर करता है.इन दोनों के लिए अब उत्सव की परिभाषा बदलती हुई मालूम होती है,आमोद का स्थान अब गंभीरता लेना शरू कर देता है.जिंदगी जो जिंदगी पे इठलाती थी,जिस्म जो जिस्म पे इतराती थी,आज बेलुत्फ हो चुके वक़्त और संघर्ष की श्रृंखलाएं इनको एक दुसरे से दूर कर रही होती है.जिस्म की आसां सी जिंदगी अब उलझी हुई पहेली मालूम पड़ने लगती है.एक दुसरे को न समझ पाने से हताश जिस्म जिंदगी पे और जिंदगी जिस्म पे संदेह करने लगती है.नजदीकियां अब दूरियों में तब्दील हो चुकी होती है.अर्श से फर्श बहुत पास मालूम होने लगता है.जिस्म के हर पैतरें जिंदगी को नासाज लगने लगती है.जिंदगी और जिस्म की वो अटखेलियाँ कविताओं और शायरियों के जुमले बन चुके होते है. जिंदगी के लिए जिस्म अब वो जिस्म न रह चुका होता है और जिस्म के लिए जिंदगी अब वो जिंदगी न रह चुकी होती है.अंततः न जिंदगी जिस्म को समझ पाती है और न जिस्म जिंदगी को... दोनों अब अलगाव की ओर अग्रसर हो रहे होते है...जिस्म की दुर्बलता के साथ उत्सव भरी ये जिंदगी क्रूर एवं निर्दयी हो चुकी होती है...एक दुसरे से जुदा होने की कामना करने लगते है...जिंदगी अब जिस्म बदलने को आतुर हो जाती है....जिंदगी की क्रूरता के आगे मृत्यु जिन्दगी से ज्यादा प्यारी लगने लगती है...और फिर जिस्म जिंदगी के रहस्य में जमींदोज़ हो जाता है..... जिंदगी के रहस्य से अलग हो अब मूड थोडा चेंज करते है और एक खुबसूरत नगमे के साथ आपसे विदा लेते है.....Hey dear Sunday,I want to sleep in your arms and have fun day.Have a great Sunday ...Cheers !!!

ये जिस्म है तो क्या,
ये रूह का लिबास है,
ये दर्द है तो क्या,
ये इश्क की तलाश है,
फना किया मुझे,
यह चाहने की आस ने,
तरा तरा,
शिक़स्त ही हुआ...