Negative Attitude

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Monday, September 10, 2012

पॉवर ऑफ सिडक्शन - अमिताभ बच्चन

ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है.....जोदि त्होर डाक शूने कोई ना आशी तोबे एकला चोलो रे,तोबे एकला चोलो,एकला चोलो,एकला चोलो,एकला चोलो के उद्घोष के साथ पंच कोटि ज्ञान कुम्भ कौन बनेगा करोड़पति 6(2012) का शानदार आगाज़ हुआ.घड़ियाल बाबु से श्रीमती टिकटिकी और अब उनकी संतान सुई मुई पंच कोटि ज्ञान कुम्भ कौन बनेगा करोड़पति 6 (2012 ) में समय के नियंत्रण की कमान संभालेगी.जिस तरह समय परिवर्तनशील है ठीक उसी तरह समय को नियंत्रित करनेवाला भी-वाह!-इस कार्यक्रम की रचनात्मकता में मानव जीवन की छोटी छोटी परन्तु बुनियादी संदेशो का समावेश इस शो को अद्भुत बनाता  है.

आम आदमी से दूर होकर भी उनसे जुड़ कर, उनके बीच बातचीत,बहस - मुबाहिसा,विचार - विमर्श एवं मनोरंजन करते हुए ज्ञान का यह खेल और वह भी सदी के महानायक  की मेजबानी में शो को लोकप्रिय तो बनाता ही है साथ साथ ज्ञान के साथ मनोरंजन का इस्तेमाल इसको एक अति विशिष्ट कार्यक्रम की फेहरिस्त में शुमार करता है.अमिताभ बच्चन की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति,भाषाओ की शुद्धता,अभिनन्दन की व्यावहारिकता और लोगो को उनके ही भाषाओ में संवाद उनके शख्शियत के साथ साथ इस शो को समस्त संसार में अतिरिक्त प्रसिद्धी तथा सम्मान प्राप्त कराता है.इस धरातल पर महिलाओं की प्रलोभन शक्ति सबसे ससक्त मानी जाता है परन्तु मनोविज्ञान अगर इस सिद्धांत से निश्चिंत हो चुका है तो मनोवैज्ञानिक इस ७० वर्षीय अमिताभ बच्चन के KBC के एक दो प्रकरण देखे,आपको यह शो Seduction Power के सिद्धांत को फिर से परिभाषित करने को मजबूर अवश्य करेगी. 

प्रणाम,कही जाइएगा मत,Let us play,शुभ रात्रि,अनेक अनेक धन्यवाद जैसे संबोधन एवं शो में पूछे गए सवालों में Item Numbers की मौजूदगी के साथ अमिताभ बच्चन की जादुई आवाज़ - मानों स्वर्ग की अप्सराएं सूर्य को बंधक बना पूरी पृथ्वी को रिझा रहीं हो.मनोरंजन उद्योग की Theory चाहे कुछ भी कहे लेकिन एक बात तो स्पष्ट है की Seduction सिर्फ बोल्ड एंड ब्यूटिफुल का मोहताज नहीं है.आज मनोरंजन उद्योग जगत में TRP के युद्ध का एक कारण यह भी है की ये जरूरत से ज्यादा लोगो को मनोरंजीत करना चाहते है.भारत की साक्षरता,संस्कृति,लोगो की आर्थिक स्थिति,भाषा का मोह एवं परंपरा की गुलामी इस देश को विचित्र बनाता है और इस विचित्रता भरे देश में मनोरंजन की अत्यधिकता वह भी निर्धारित प्रारूप के साथ,स्त्री के प्रलोभन शक्ति पे बेइन्तेहाँ निर्भरता टेलीविज़न मनोरंजन को दिन ब़ा दिन उबाऊ बनाता जा रहा है.अब मनोरंजन उद्योग उद्देश्य पे कम TRP की अधिकता पे ज्यादा ध्यान केन्द्रित कर रहा है.KBC की रचनात्मकता,प्रारूप को देखकर सीख लेनी चाहिए जो हर बार एक नया अवतार और एक नयी कटिबद्धता के साथ प्रतियोगियों में भी विविधता प्रस्तुत करता है.टेलीविजन समाचार,मनोरंजन के स्रोत के साथ साथ जनता की राय गढ़ने का भी एक शक्तिशाली माध्यम है और अगर इसका इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए तो विशालकाय TRP स्वयं ही स्थापित हो जायेगी.

Entertainment,Entertainment,Entertainment का फ़ॉर्मूला सिर्फ क्षणिक मनोरंजन के लिए कारगर सिद्ध हो सकती है,परन्तु विशालकाय TRP स्थापित नहीं कर सकती.विशालकाय TRP स्थापित करने के लिए Edu-tainment,Info-tainment एवं Fami-tainment फ़ॉर्मूला अपनाना होगा जिससे लोगो की नजरों में टेलीविजन के माध्यम से मनोरंजन के प्रति एक सकारात्मक सोच तैयार तो होगी ही साथ साथ हमारे देश के दूर दराज़ इलाको में जहाँ शिक्षा के बहुत सिमित विकल्प है,वहाँ विविधताओ से भरे इस प्रकार के कार्यक्रम आम लोगो के जीवन की बुनियादी अवश्यक्ताओ का हिस्सा बनने में भी कामयाब होगा.टेलीविजन को आम लोगों से जोड़ने के प्रयास के वजाए आम लोग टेलीविजन से कैसे जुड़े,इस पर सोचने की जरूरत है और अगर यह संभव हो पाया तो फिर TRP क्या है,यह खुद ब़ा खुद टेलीविजन कार्यक्रमों के कदम चुमेंगी... अमिताभ बच्चन जी आप अद्वितीय है...:-)


[*Edu - Education,Info - Information,Fami - Family
* टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स - टीआरपी (TRP) एक कसौटी है जो एक चैनल या कार्यक्रम की लोकप्रियता इंगित करती है]

Sunday, September 9, 2012

SUNDAY...खुशामदीद..:-)

रात भी इस ब्रह्माण्ड को चलाने में उजाले के बराबर योगदान देता है.रात एक नए दिन के शुरुआत,एक नई रौशनी की मार्गदर्शक है.रात समय की वह गति है जो हमारे जीवन में सूर्य,उजाले  की सीमित आकांक्षा को प्रमाणित करता है.रौशनी के दिए हुए जख्मो को आराम प्रदान करता है ताकि फिर से हम दुबारा इसके द्वारा दिए जाने वाले जख्म का सामना कर सके.रात हमें सपने दिखता है ताकि जिंदगी से जुडी आशाओं की गतिवृद्धि हो सके.रात हमारे शरीर के खर्च हुए उर्जा को समायोजित कर पुनः ताजादम करता है.रात उजाले की ख़्वाहिश,चाहत का संरक्षण करता है ताकि हमारी रौशनी से मोहब्बत कभी कम न हो सके.अँधेरे में रौशनी रौशनी नहीं वल्कि इसकी जीवन संगिनी लगती है.रात के अँधेरे में ही सितारे की रौशनी चकाचौंध लगती है,उजाले सितारों की चमक,सितारों की उंचाई क्या जाने? अँधेरे में रौशनी की चमक के साथ रात और भी मादक हो जाती है जैसे की उजाले के थकान के नशे में मदहोश हमारा शरीर रात के आगोश में लिपट जाने को आतुर होता है.रात शुन्य का परिचायक है जो हमें आगे,तेज भागने और भागते रहने का सन्देश देता है.रात रौशनी का अस्थायी का अंत है जैसे दिन रात का,अंधकार का.जीवन की हर एक रात बीता हुआ पल है वही हर एक दिन एक नया जीवन,एक नयी आशा,एक नया प्रोत्साहन है,एक नयी तस्वीर है,एक नया संघर्ष,एक नयी उपलब्धि है.दिन कोरा कागज है तो रात स्याही.दिन एक लेख है तो रात एक लेखक.दिन अगर गुमान है तो रात एक ईमान है.फूल रातों में भी खिलते है उजालो की शक्ल में,कही नाम रात रानी तो नहीं!!!!

A very good morning SUNDAY...खुशामदीद..:-)

Thursday, September 6, 2012

वक़्त हर जख्म को मिटा देती है,क्या यह सत्य है?

लोग अक्सर कहा करते है की वक़्त हर जख्म को मिटा देती है, क्या यह सत्य है? क्यों है वक़्त पे इतना यकीं? बीते हुए यादों की कड़वाहट,पुराने जख्मों के निशां एवं छुपे एहसास खराश बनकर क्या जख्मों के टीस को पुनः जवां नहीं कर देती.ये तो मुस्कराहट है जो बीते को बीता समझ इन जख्मों से दूरियाँ बनाने की कोशिश करती है.ज़ख्मों की नाप तौल करते होंठो पे बलखाते ये मुसकुराहट,खर्च हुए साँसों की कीमत अदा कर रही होती है.
उलझनें उलझन से कह रहीं होतीं है की जख्म भले ही जख्म हों रहती तो ये साथ हैं,ख़राशों का क्या, इसके ज्वार न जाने कब आये और इन जख्मो को पुनः जख्मी कर कर लुप्त हो जाए.जख्म और ख़राशों के इस द्वन्द्व युद्ध से दहसतजुदा मुस्कराहट जीवन के कलरव के बीच मुस्कुराने के लिए परिस्थितियों की दासी हों जाती है.अच्छे दिखने की मुसकुराहट,अच्छे बनने की मुसकुराहट,मुसकुराहट के मन के विरुद्ध मुस्कराहट,मन के ज्वाला की मुसकुराहट,मुसकुराहट छिनने की मुसकुराहट,आमोद प्रमोद की मुसकुराहट,अहंकार की मुसकुराहट-बस वजहों के कैद हों कर रह जाती है मुसकुराहट या यूँ कहें खुशियाँ बिना वजह के मुस्कान नहीं बन सकती.खुशियों और मुस्कान के इन्ही वजहों की खोज में हम मनुष्य आज जीवन प्रबंधन के अध्यन में जुटे है.जीवन की उलझनों को और उलझाने लगे है.पारदर्शिता से परे उलझनों को पैतरे और कलाबाजियों से सुलझाने में लगे है.खुशियों को बेवजह खुश करने में लगे है.जख्म एवं ख़राशों की पारदर्शी कार्यशैली ही इनके टीस को विशुद्ध बनाती है ठीक इसी तरह मुसकुराहट की पारदर्शिता मुस्कुराकर ही महसूस की जा सकती है.जब कोई भी नवजात जीवन क्रियाशील होता है तब रोता है परन्तु उसके आगमन एवं क्रियाशील होने के उल्लास में हम तमाम लोग हर्षित होते है,उत्सन मनाते है.एक वक़्त ऐसा भी होता है जब रोने की दिखावटी भावाभिव्यक्ति रोते हुए नवजात जीवन को हँसा देती है.रोने और हँसने की अभियांत्रिकी बिलकुल स्पष्ट है.वजह अगर मृगतृष्णा बन जाए तो जख्म और खराशें टीस देतीं रहेंगी लेकिन एक जीवन के क्रियाशील होने की क्रिया एवं प्रतिक्रिया के विशुद्ध एवं पारदर्शी भाव खुशियों की स्वागत करती ख़ुशी पे गौर करे तो मन में ये प्रश्न बार बार उठता है की हम मुस्कुराना चाहते है या सिर्फ परिस्थितयों के आगोश में ही मुस्कुराना चाहते है क्योंकी हमारे जीवन में जख्म भी होंगी,अज्ञात खराशें भी होंगी,सोचना यह है की वजहों से लैस मुस्कुराहटों से जख्म और ख़राशों का अंतर समझना है या मुस्कुराहटें वजहों के मिजाज समझने में स्वयं सक्षम है यह मानते हुए इस उहापोह का समाधान इनके ही ऊपर छोड़ देना है.जहाँ तक जीवन प्रबंधन की सूत्र तलाशने की बात है यह वाक्य जख्म भले ही जख्म हों रहती तो ये साथ हैं,ख़राशों का क्या,इसके ज्वार न जाने कब आये और इन जख्मो को पुनः जख्मी कर कर लुप्त हो जाए जीवन प्रबंधन की गहराई समझने के लिये पर्याप्त है.मानव जीवन बिलकुल सहज है और सहजता के लिये प्रबंधन का कोई स्थान नहीं होता.जख्म तो जख्म हैं टीस तो उठेगी ही पर इसको नियंत्रित करने की एक ही औषधि है मुस्कुराना,मुस्कुराते रहना वह भी वजहों से आज़ाद होकर.So ,Smile,even if it's a sad smile,because sadder than a sad smile is the sadness of not knowing how to smile...:-)

Sunday, September 2, 2012

परिणाम जो भी हो आघात भारतीयता होगी,शर्मशार भारतीयता होगी.....

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख श्री राज ठाकरे ने बिहारीओं को घुसपैठियें मान पहले तो उनको महाराष्ट्र से खदेड़ने की धमकी दी और फिर अब हिंदी चैनलों को बंद करवाने की धमकी दे रहे है.हिंदी भाषा से कम पर हिन्दीभाषी लोगो के साथ इनका अच्छा खासा लगाव रहा है या यूँ माने की हिन्दीभाषी लोगो के खिलाफ आग उगलना इनकी सफलता का महामंत्र है,इनकी सफलता की कुंजी है.महाराष्ट्र और मुंबई के विकास की धीमी गति,लचर एवं असुरक्षित होती प्रशासनिक व्यवस्था की कोई राजनेता या राजनितिक पार्टियाँ जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती परन्तु लाल बत्ती से रौशन राजनितिक जीवन में अपनी मौजूदगी और प्रभाव का एहसास प्रत्येक राजनेता या राजनितिक पार्टियाँ कराती रहनी चाहती है.अपने जनता को उनके ही मौलिक मुद्दों से ध्यान दिग्भ्रमित कराने के लिए महाराष्ट्र की राजनितिक पार्टियां समय समय पर हिन्दीभाषी लोगो के खिलाफ आग उगलने की वयानबाजी जैसी मसालेदार और चटपटी राजनीती करती रहती है.आजाद मैदान की घटना के बाद उमड़े इनके महाराष्ट्र प्रेम का गुबार इनकी क्षीण होती रचनात्मकता वाली राजनीती के लिए एक उत्सव है.अव उत्सव होगी तो जश्न भी होगा और राजनितिक जश्न यानी  वैमनष्य का,एक दुसरे को तोडने का,गुमराह करने का,विशुध कलियुगीया जश्न...हिन्दीभाषी,बिहारी,यु.पी वाले भैया,नॉर्थ इंडियन जैसे शब्द तो राजनीती में भोजन मेज पे परोसने वाले वयंजनो के नाम है और वैमनष्य की वयानबाजी इन वयंजनो को चटकदार बनाने के मील एकम्पनिमेन्ट्स या साइड डिश है.हिन्दुस्तानी संस्कृती में चटपटा खाना,मसालेदार फिल्म,मसालेदार राजनीती की बढती रूचि पूरी सभ्यता को बीमार करती जा रही है.चाहे वो सामाजिक सभ्यता हो या राजनितिक.हर तरफ आईटम की तलाश और आईटम जैसी भावो की प्रस्तुति से लोग अपनी मृत होते रचनात्मकता एक अच्छा परिचय दे रहे है.कर्म और मनोरंजन जीवन की दो विभिन्न आवश्यकताएं है.कर्म को मनोरंजन की शक्ल देना कर्म और मनोरंजन दोनों की गुन्वत्ताओं का अपमान तो है ही साथ साथ इसके साख को बट्टा  लगाना है.इस कुष्ठ सोच की गवाह होती हमारी कोमल एवं जवान पीढियां पता नहीं कर्म के इस गिरते स्तर को किस तरह लेंगे परन्तु यह स्पष्ट है की कोमल पत्तियां समय के थपेड़े,मौसम के सानिध्य में एवं बदलते स्वरुप के साथ ही परिपक्व होती हैं फिर वैमनष्य का यह व्यापक विज्ञापन क्या हमारी कोमल एवं युवा पीढ़ियों की परिपक्वता में एक गभीर विकृति पैदा नहीं करेगी? प्रसासनिक व्यवस्था में राजनितिक हस्तक्षेप, दोनों की कार्यशैली का प्रश्नवाचक उदहारण है,नियमो के पेशेवर तरीके का  इस्तेमाल ही नियमो की गरिमा और लोगो के प्रति इसकी श्रद्धा को बढ़ाएगा न की व्यक्तिगत या राजनितिक भावनाओं के प्रवृत्त हो.वैमनष्य फैलाना एक प्रकार का शोषण है जो न सिर्फ एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह को जहरीला बनाता है वल्कि यह पुरे मानवीय जीवन की श्रृंखलाओं को दूषित कर देता है.हम सब ये क्यों नहीं समझ पाते की विधायिका की राजनीती भी स्वार्थ के लिए होती है अगर यह सत्य नहीं होता तो राष्ट्रपति बनने के लिए राजीनीति पार्टी सहित सभी लाभ के पद को त्याग देना होता है.जब हमारा संबिधान मानता है की लोकतंत्र की राजनीती भी स्वार्थ के लिए होती है,लाभ के लिए होती है तो फिर हम क्यों नहीं समझ पाते, हम क्यों एक राजनितिक इशारे पर एक दुसरे को मरने मारने पे तुल जाते है.एक राजनीतिज्ञ के बातो से प्रवृत्त हो ये क्यों भूल जाते है पहले हम भारतीय है बाद में अपने माता पिता,पैत्रिक स्थान,गृह स्थान या गृह राज्य के.अगर हम भारतीयता को भूल जायेंगे तो देश प्रेम देश प्रेम कैसा? अमर जवान की मूर्तियों पे आघात निस्संदेह निंदनीय है पर मुंबई की अमर जवान पुरे हिन्दुस्तान का अमर जवान है,मुंबई की शान पुरे हिन्दुस्तान की शान है.देश द्रोहियों को दण्डित करना किसी एक राजनेता या राजनितिक पार्टी की जागीरदारी नहीं,यह संबिधान का काम है और हमारा संबिधान देश की रक्षा के प्रति हमसे ज्यादा जिम्मेदार है.हम और आप बोलकर देशप्रेम प्रदर्शित नहीं करते वल्कि इसकी आड़ में भी लाभ के विकल्प तलाशने की कोशिश में लगे रहते है पर हमारा संबिधान बोलता नहीं,करता है! प्रसासनिक व्यवस्था में समन्वय में लापरवाही होगी तो संवाद भी होगा,इसमें गलत क्या है,ये भारत देश के अधिकारी है किसी एक राज्य के नहीं और अपने जिम्मेदारी के अधिकारों का वैधानिक इस्तेमाल करना इनका कर्त्तव्य एवं इनके पदभार करते समय का शपथ भी.राजनितिक हस्तक्षेप की जरूरत है क्या इसमें अगर है तो क्यों? व्यवस्था या सिस्टम पे प्रश्न के वजाय प्रांतवाद एवं जहर फैलाने की राजनीती क्यों? बात निकली है तो उत्पात भी होगा,एक दुसरे से लड़ेंगे भी,किसी का घर वीरान होगा तो किसी की रोजी पे प्रहार.हमारी सरकार इन राजिनितिज्ञों पे लगाम लगाने के वजाए एक नए HELPLINE NO बनाने की कवायद अवश्य शुरू कर दी होगी.आपात स्थिति है भाई.परिणाम जो भी हो आघात भारतीयता होगी,शर्मशार भारतीयता होगी.....

Saturday, September 1, 2012

और फिर जिस्म जिंदगी के रहस्य में जमींदोज़ हो जाता है.....

एक वक़्त होता है जब जिंदगी बहुत आसां लगती है.जिंदगी की हरेक राहें मानों जिंदगी की ओर खिचती चली आती है,जिंदगी की हरेक लम्हें जिंदगी के साथ जश्न में डूबी रहती है.जिंदगी हर वक़्त उड़ने को बेताब रहती है,ऊँचाइयों को छूने के नित नए नए ख्वाबों में डूबी रहती है.जिंदगी को जिस्म मिला होता है और जिस्म को जिंदगी.ऊँचाइयों का ख्वाब,उड़ते रहने का ख्वाब,हर वक़्त उत्सव मानते रहने का ख्वाब ही दोनों की खुशियाँ और जश्न होती है.उत्सव मनाते मनाते इन दोनों को पता नहीं चलता की वक़्त क्या होता है,इसकी गति कितनी तीव्र होती है और यह इस उत्सव की अवधि को अपने आगोश में कितनी तीब्रता से लील लेता है.पर जिंदगी और जिस्म को इनसे क्या लेना.अभी तो ये आमोद कर रहे होते है.उत्सव भरे लम्हें इन्हें एक दुसरे से जुदा होने नहीं देते ,इन्हें ये ज्ञात होने नहीं देते की ये दोनों एक होकर भी एक नहीं है.उम्र की बढती आयु एवं समय की तीब्र परन्तु इसकी नीरव चाल धीरे धीरे इन दोनों के ऊँचाइयों का ख्वाब,उड़ते रहने का ख्वाब पुरे करने का आभास दिलाती है.जिस्म और जिन्दगी अब एक दुसरे से मुड़ने लगते है,दोनो का एक ही मकसद होता है,ख्वाबों को पूरा करने का संघर्ष शुरू करना परन्तु समय की मादक चाल के साथ साथ जिंदगी को जिस्म और जिस्म को जिन्दगी का मोह इन्हें इनसे जुदा करने लगती है.परिवर्तन के गवाह होते ये दोनों एक दुसरे को समझना शुरू करते है परन्तु ये इतना आसां कहाँ? एक दुसरे को समझने और ख्वाब पूरा करने का संघर्ष इनको जवान से बुजुर्ग होने को मजबूर करता है.इन दोनों के लिए अब उत्सव की परिभाषा बदलती हुई मालूम होती है,आमोद का स्थान अब गंभीरता लेना शरू कर देता है.जिंदगी जो जिंदगी पे इठलाती थी,जिस्म जो जिस्म पे इतराती थी,आज बेलुत्फ हो चुके वक़्त और संघर्ष की श्रृंखलाएं इनको एक दुसरे से दूर कर रही होती है.जिस्म की आसां सी जिंदगी अब उलझी हुई पहेली मालूम पड़ने लगती है.एक दुसरे को न समझ पाने से हताश जिस्म जिंदगी पे और जिंदगी जिस्म पे संदेह करने लगती है.नजदीकियां अब दूरियों में तब्दील हो चुकी होती है.अर्श से फर्श बहुत पास मालूम होने लगता है.जिस्म के हर पैतरें जिंदगी को नासाज लगने लगती है.जिंदगी और जिस्म की वो अटखेलियाँ कविताओं और शायरियों के जुमले बन चुके होते है. जिंदगी के लिए जिस्म अब वो जिस्म न रह चुका होता है और जिस्म के लिए जिंदगी अब वो जिंदगी न रह चुकी होती है.अंततः न जिंदगी जिस्म को समझ पाती है और न जिस्म जिंदगी को... दोनों अब अलगाव की ओर अग्रसर हो रहे होते है...जिस्म की दुर्बलता के साथ उत्सव भरी ये जिंदगी क्रूर एवं निर्दयी हो चुकी होती है...एक दुसरे से जुदा होने की कामना करने लगते है...जिंदगी अब जिस्म बदलने को आतुर हो जाती है....जिंदगी की क्रूरता के आगे मृत्यु जिन्दगी से ज्यादा प्यारी लगने लगती है...और फिर जिस्म जिंदगी के रहस्य में जमींदोज़ हो जाता है..... जिंदगी के रहस्य से अलग हो अब मूड थोडा चेंज करते है और एक खुबसूरत नगमे के साथ आपसे विदा लेते है.....Hey dear Sunday,I want to sleep in your arms and have fun day.Have a great Sunday ...Cheers !!!

ये जिस्म है तो क्या,
ये रूह का लिबास है,
ये दर्द है तो क्या,
ये इश्क की तलाश है,
फना किया मुझे,
यह चाहने की आस ने,
तरा तरा,
शिक़स्त ही हुआ...

Saturday, August 25, 2012

राजनीतिक गठबंधन मतलब राजनीतिक हनीमून

जैसा की हम सभी जानते हैं की राजनीतिक गठबंधन विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा एक आम राजनीतिक एजेंडे पर चुनाव लड़ने या सामूहिक रूप से चुनाव के बाद सरकार के गठन के लिए पारस्परिक लाभ के प्रयोजनों के लिए एक समझौता है.जब कोई एक राजनीतिक दल को बहुमत प्राप्त नहीं होता तब सरकार गठन करने के लिए कई राजनीतिक दलों का एक साथ मिलना एक राजनीतिक गठबंधन कहा जाता है.समझने में
ये बात तो बहुत ही सहज मालूम पड़ती है पर आज के आधुनिक दौर की राजनितिक परिस्थितियां गठबंधन की कुछ अलग ही परिभाषा वयां करती है.हाल ही में एक गणमान्य राजनेता का एक पत्रिका The Week को दिए साक्षात्कार से गठबंधन शब्द का एक नया अवतार सामने आया है.यह साक्षात्कार (“Once my honeymoon with the BJP is over,I will be free to have alliance with any party that supports my goal of making --- a developed state”) मीडिया एवं राजनितिक दलों को ३-४ दिन तक गरमाए रखा और फिर ताप के चढ़ते पारो को देखते हुए The Week पत्रिका ने इस साक्षात्कार को अपने वेबसाइट से फ़ौरन हटा भी दिया. वही दूसरी तरफ इस साक्षात्कार को पूरी तरह से बेबुनियाद बताया गया.अगर यह सत्य है तो यहाँ न्यूज़ की विश्वश्नियता के लिए मीडिया के ऊपर भी प्रश्न उठनी चाहिए? मतलब चाहे जो भी निकालें साक्षात्कार या साक्षात्कार में वर्णित अंश भारतीय लोकतंत्र में गठबंधन की एक नयी दिशा एवं दशा का इशारा करती है.अब गठबंधन एक आम राजनीतिक एजेंडा नहीं बल्कि लाभ के प्रयोजनों का हनीमून है.गठबंधन के इस नए अवतार के लिए सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के आपस में कमजोर समन्वय ही जिम्मेवार मानी जायेगी.जो बात इनको आपस में बैठ करनी चाहिए वो मीडिया के जरिये कह रहे है.एक गठबंधन को क्या किसी मातहत की जरूरत होनी चाहिए अगर हाँ तो वो गठबंधन नहीं हो सकती? विभिन्न राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक शासन के प्रति समझ की बदलती शैली पांच वर्ष की आयु वाली संसदीय व्यवस्था को तो प्रभावहीन बनाएगा ही साथ साथ १२२ करोड़ हिन्दुस्तानियों के देखभाल का उत्तरदायित्व एक व्यंग्य मात्र रह जाएगा.माफ़ कीजियेगा,अगर एक राजनीतिक गठबंधन हनीमून है तो फिर राजनीतिज्ञों के लिए प्रजातंत्र क्या विलासिता की रसायन मानी जाए? विकास एक अति महत्वपूर्ण मुद्दा के साथ साथ जरूरत भी है पर क्या संबैधानिक भावनाओं के मनोवैज्ञानिक शोषण की कीमत पर? राजनीतिज्ञ उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनाव परिणाम यानी कमल [राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग)] और हाथ {संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग)} पे उठते विश्वास को भूलते नजर आ रहे है? आम आदमी द्वारा क्या राजग क्या संप्रग जैसे कुंठा भरे संबोधन आम आदमी के प्रजातंत्र के प्रति श्रद्धा को कम करता जा रहा है.तत्कालीन परिस्थितियाँ लोकतंत्र को खोखला और जर्जर करती जा रही है,प्रजातंत्र की आधारभूत मान्यता है कि जो भी पार्टी सत्ता में हो उसे देश के मतदाताओं का बहुमत प्राप्त हो पर अपने देश में सत्तासीन होने के लिए केवल सदन के अन्दर सदस्यों का बहुमत जुटा लेना काफी है,सदन के बाहर मतदाताओं के बहुमत कि आवश्यकता नहीं होती और यही कारण है की गठबंधन और हनीमून एक समान हो गया है या फिर कहे की राजनीतिक गठबंधन अब राजनीतिक हनीमून हो गया है? हम अपने संबिधान के लक्ष्यों से कितना भटक गए हैं? और अब यह आवश्यक हो गया है की सारे राजनितिक दल एवं गणमान्य राजनेतागण भारतीय संबिधान की प्रस्तावना को पुनः पढ़ अपने याद्दास्त को ताज़ादम करे.स्वतंत्रता के बाद भारतीय नेताओं ने एक साथ बैठ कर गहन विचार विमर्श के बाद देश के लिए एक संविधान तैयार किया था,जो कई संशोधनों के साथ आज भी लागू है.आइये एक नजर भारतीय संबिधान की प्रस्तावना पर डालते हैं...

भारतीय संबिधान की प्रस्तावना में कहा गया है

  • “हम भारत के लोग, भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न सामाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को समाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वाश, धर्म और उपासना की स्वंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा सभी के लिए व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढाने के लिए, द्रढ संकल्प हो कर, एतद द्वारा इस संबिधान को अंगीकृत और आत्मार्पित करते हैं"

उपरोक्त लक्ष्यों को और भी स्पष्ट करते हुए, संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में भी कहा गया है:


  • राज्य आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और केवल व्यक्तियों के बीच नहीं बल्कि विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा, और सभी लोगों के पोषाहार और जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के साथ ही लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्य मानेगा

भारतीय संविधान के अनुसार किसी भी राज्य के दो प्रमुख कर्तव्य हैं,


  • १) सभी के लिए न्याय तथा उनके बीच अवसरों और सुविधाओं की समानता सुनिश्चित करना
  • २) लोकतंत्र को मजबूत बनाना

संबिधान के लागू होने के 65 वर्षों बाद भी संबिधान के लक्ष्यों को प्राप्त करने में हमें कितनी सफलता मिली है??? हाल ही के मुंबई के आज़ाद मैदान की घटना,असम में जारी हिंसा,देश के विभिन्न शहरो से पूर्वोत्तर के लोगो का पलायन,असंख्य गावं आज भी पक्की सड़कों से नहीं जुड पाऐ हैं,असंख्य गावं आज भी बिजली और पानी जैसी सुविधाओं के लिए मोहताज है इत्यादि - क्या हमारे विकाश के शौर्यगाथा की परिचय के लिए यह पर्याप्त नहीं है??? आज भारत दो खंडो में बंट चूका है,एक शहरी भारत और दूसरा ग्रामीण भारत,शहरी भारत प्रगति की ओर बढ़ रहा है वहीँ ग्रामीण भारत गर्क और बदहाली की ओर.अनुभव करना है तो बिहार जाकर देखें,उत्तर प्रदेश जाकर देखें, पशिम बंगाल जाकर देखें.हाल ही में पशिम बंगाल के 24 Pargana(साउथ) जिला भ्रमण करने का मौका मिला जो कोलकाता सिटी से महज ६०-७० किलोमीटर की दुरी पर है.यहाँ का हाल यह है जैसे मानो लोग मनुष्य की जिंदगी नहीं वल्कि जानवरों से भी बदतर जिंदगी जी रहे हो.सरकारी सुविधाएं मानों इनके लिए स्वप्न हो.ये तो एक सुक्ष्म उदाहरण है तह तक जायेंगे तो अपने आप को भारतीय बताने में संकोच होने लगेगा.अगस्त का महीना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बड़ा ही यादगार महीना रहा है,भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता दिवस तक,अगस्त का महीना इन सभी ऐतिहासिक लम्हों का गवाह रहा है.परन्तु अगस्त महीने की ये घटना जिसमे राजनितिक स्वरुप एवं  इसके  बदलते मायने इस महीने की विरासत पर एक तीक्ष्ण अघात है.हर वर्ष अगस्त आते ही पूरा देश स्वतंत्रता का जश्न मनाना शुरू कर देता है.पर सवाल यह है आज़ाद भारत से आबाद और खुशहाल भारत बनने में और कितने वर्ष लगेंगे?  भारतीय संबिधान की प्रस्तावना में वर्णित एक-एक लफ्ज़ हकीक़त में कब तब्दील होगी? चंद योजनाओं का हवाला दे असंख्य तड़पते मनुष्य की उपेक्षा विकसीत नहीं वल्कि खोखली,जर्जर राजनितिक एवं सामाजिक व्यवस्था दर्शाता है.हनीमून,पक्ष और विपक्ष से ऊपर उठकर राजनीती करनी होगी वर्ना हमारी यह संबिधान कही टुकडो में न बट जाएँ,प्रजातंत्र का कोई नया नामांकरण या नयी परिभाषा न हो जाए? कैसी भी राजनीती हो परन्तु जनहित से परे एवं संबैधानिक मर्यादाओं/कटिबद्धताओं का बलात्कार कर नहीं.व्यवस्था परिवर्तन से ज्यादा जरूरी है संबिधान के प्रति भारतीय राजनीती का परिपक्व,संवेदनशील और पेशेवर होना.वगैर इसके प्रगतिशील,खुशहाल देश की कल्पना नहीं की जा सकती....जागो भारत जागो....भूल चुक लेनी देनी...:-)

Tuesday, August 14, 2012

13th August 2012 - खादी भगवा समझौता

13th August 2012 (सोमवार) को काले धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ पांच दिन से रामलीला मैदान में अनशन कर रहे योगगुरु बाबा रामदेव के समर्थकों का उन्माद देखकर ऐसा लग रहा था जैसे ये आन्दोलन एक सफल आन्दोलन है और देश के उत्थान के लिए है.लोग,यहाँ तक की मीडिया भी कहने लगी की योगगुरु बाबा रामदेव ने अन्ना हजारे का आन्दोलन हाइजैक कर लिया. विपक्षी पार्टियों के गणमान्य प्रतिनिधियों का एक साथ मंच पे आना,हाथ में हाथ मिला एक साथ ग्रुप फोटो और उनके भाषण के तेवर मानो ऐसे लग रहे जैसे इस आन्दोलन को उन्होंने ने ही अपरोक्ष रूप से संगठित किया हो. अब आन्दोलन के स्वाद की राजनीती का रिवाज़ हो गया है.जो आन्दोलन जितना स्वादिष्ट विपक्षी पार्टियों का उतना ही प्यार, दुलार और समर्थन.अगर आप अन्ना हजारे के आन्दोलन के समय हुए लोकसभा में लोकपाल पर हुए बहस देखे होंगे तो जरूर याद होगा की ये वही विपक्षी पार्टियाँ हैं जिन्होंने लोकपाल बिल की संकल्पना को पास ही होने नहीं दिया.जैसा भी लोकपाल था, एक बार पास हो जाता,उसका कार्यान्वयन होता. तभी तो पता चल पता की उसमें खामियां क्या है? पहले दिन से ससक्त लोकपाल..ससक्त एक शब्द है और इसको इसके उद्देश्यों के मुताबिक परिभाषित किया जा सकता है.अगर हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास रखते है तो एक बार लोकपाल बिल पास कर देते और संशोधन का प्रावधान तो है ही हमारे पास.जरूरी होने पर बेहतरी के लिए समय समय पर सर्वसहमति से संशोधन करते रहते.क्या हम भूल गए है की जरूरतों के अनुसार हमारे संबिधान में समय समय में संशोधन होता आया है??? लेकिन हम लोकपाल और ससक्त लोकपाल की दूरिओं को पाटना ही नहीं चाहते पर यह प्रदर्शित करना चाहते है की लोकपाल चाहिए.इसके लिए नौटंकी तो करनी पड़ेगी-प्रजातंत्र में नौटंकी मतलब रैली/अंदोलन और क्या? हमारे देश में आन्दोलन की सफलता भीड़ से आँकी जाती है.हाँ ये बात अलग है की जनता की भीड़ और जनता का समर्थन दो अलग अलग शब्द है जैसे की भ्रष्टाचार और कला धन.2010 के बिहार विधान सभा में श्री लालू प्रसाद यादव के चुनावी रैलियों में भी जन सैलाव उमड़ा करता था लेकिन इसके परिणाम आप सब देखे ही होंगे, बिहार के शक्तिशाली राजा माने जाने वाले श्री लालू प्रसाद यादव की हालत ठीक वैसी हुई जैसी स्वतंत्रता संग्राम के वक़्त अनगिनत राजाओं और निजामों की हुई थी.भारतीय राजनीती सतरंज का खेल है, दांव/पेंच की परिपक्वता ही विजय या पराजय निर्धारित करती है.इस बार योगगुरु बाबा रामदेव की तैयारियों और परिगणना की दाद देनी होगी.सरकार के लिए संसद का मोंसून सत्र का संचालन एवं स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों एवं सफल क्रियान्वयन का दवाब - हुआ ना योगगुरु बाबा रामदेव का मौके पे चौका.वही दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों का दुसरे के कंधे पे बन्दूक रख गोली चलाना लोकोक्ति का अनुसरण - बनी बनायी मंच,मानी मनाई भीड़,सजी सजाई शय्या और समां बाँधते योगगुरु बाबा रामदेव - भीड़ जुटाने में मृत हुए आत्मविश्वास वाली विपक्षी पार्टियों के लिए लाभ की रोटी सेकने और सत्ता पक्ष पे हमला करने का  इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता है.योगगुरु बाबा रामदेव का तीन दिन का सांकेतिक अनशन पांच दिन तक दिल्ली को गरमाए रखा.ये काला धन का जनांदोलन नहीं वल्कि खादी का भगवा में विलय है.खादी का भगवा के साथ एक गुप्त समझौता है.एक जनांदोलन दुसरे जनांदोलन की महत्ता को कम करे वो आन्दोलन हो सकता है जनांदोलन नहीं.उद्द्देश्य का चरम तो दोनों का भ्रष्टाचार ही था.अगर विपक्षी पार्टियाँ कमजोर एवं खोखले हो तो ऐसा ही होगा.अन्ना हजारे के आन्दोलन में भीड़ कम थी इसलिए वो आन्दोलन फेल वही योगगुरु बाबा रामदेव के आन्दोलन में भीड़ तो आन्दोलन सफल.शाम होते ही जैसे सरकार ने कला धन पे संसद में बहस का एलान किया तो मीडिया ने इस न्यूज़ को ब्रेकिंग न्यूज़ का दर्जा दे न्यूज़ के पहले वाक्य में आन्दोलन के आगे झुकी सरकार और दुसरे वाक्य में संसद में काले धन पे कल बहस होगी.मैंगो मैन के मुकाबले मीडिया तो राजनितिक बारीकियां और पैतरेबाजी  समझने में निपुण है फिर उपरोक्त ब्रेकिंग न्यूज़ का क्या मतलब है.आन्दोलन की सफलता बताना या सरकार मजबूर है ये दर्शाना? अगर स्वाद और भीड़ वाली आन्दोलन की राजनीती होने लगेगी तो सरकार चाहे किसी की भी हो लोकतंत्र कभी भी लोकतंत्र की परिकल्पना के अनुसार नहीं चलेगा.पांच वर्ष की आयु वाली संसद की रुकावट बनकर रह गयी है ये जनांदोलन.हर आदमी अब प्रजातंत्र को अपने अपने मुद्दे पे चलाना चाहता है.मैंगो मैन तो सिर्फ मैंगो ही बनकर रह गया है.हमारे देश में पहले से ही बहुत सारी चुनौतियां(जैसे भूख,गरीबी,रोजगार,बिजली,शिक्षा,नक्सलवाद,जनविनाशवाद आदि ) है जिनका हल तालाशना कला धन से ज्यादा महत्वपूर्ण है.अगर जनांदोलन हो तो इनके लिए हो जिससे आम आदमी से अब मैंगो मैन पुकारी जाने वाली जनता का हित हो सके.वैसे 13th August 2012 का दिन एक ऐतिहासिक दिन था.13th August 2012 खादी भगवा समझौता/ खादी का भगवा में विलय के लिए भारतीय राजनीती के इतिहास में याद किया जायेगा.कल छेयासठ्वा स्वतंत्रता दिवस है ६६ वर्ष बुजुर्ग हो चुके स्वतंत्र भारत को ये सोचने की जरूरत है क्यों असंख्य भारतवासी अभी भी भूख,गरीबी,रोजगार जैसे जीवन की बुनियादी सुविधाओ से महरूम है?आजाद भारत आबाद भारत कब बनेगा?...Happy Independence Day..Jai Hind...