Negative Attitude

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Friday, January 25, 2013

जन गण मन अधिनायक जय हे...

भारतीय गणतंत्र की 64व़ी वर्षगांठ। पक्का पक्की एक और छुट्टी का दिन! हम मैक्सिमम सिटी वाले मेजोरिटी से माइनॉरिटी बनने के लिए हर दिन भारतीय रेल से ही यात्रा किया करते है। यहाँ की ट्रेन में यात्री-गण का अपना छोटा छोटा समूह होता है जो अपने समूह के लोगो के लिए सीट(Seat) रखने में अपना सर्वस्प लगा देते है। इसी समूह में मैं भी अल्पसंख्यक की तरह सीट के मध्य जो जगह होती है में सबसे पीछे मौजूद रहता हूँ। ट्रेन अपने नियत समय पर रवाना हुई और साथ साथ गपाश्टक चालीसा भी शुरू हो गया। एक यात्री ने अपने मित्र से कहा क्यों भाई कल तो छुट्टी है..क्या प्रोग्राम है? मित्र - कुछ नहीं भाई कल ड्राई डे (Dry day) है...खंभा आज ही लेना पड़ेगा ? सुनकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो अभी भी आम आदमी अपने आप को गुलाम महसूस कर रहा हो। आम आदमी की दयनीय होती परिस्थिति से देशभक्ति की भावना भी अब कितना बोझिल हो चुकी है की भारत के गण के लिए गणतंत्र दिवस के मुकाबले ड्राई डे (Dry day) की महत्ता का ज्यादा ख्याल है? वैसे गणतंत्र दिवस और गणतंत्र का शाब्दिक अर्थ तो हम सबको पता ही है.बस नहीं पता है की इस राष्ट्र गान जन-गण-मन का अधिनायक कौन है? किसकी स्तुति गाते है हम? और क्यों?  एक बार फिर मंथन!

गणतंत्र दिवस:- जैसा की हम सभी जानते है की 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था,तभी से देश गणतंत्र हुआ और उसी उपलक्ष मे 26 जनवरी को हर वर्ष गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। गणतंत्र या गणराज्य का शाब्दिक अर्थ संख्या अर्थात बहुसंख्यक का शासन है। सैंकड़ो वर्षों की गुलामी और आजादी के नाम मिले विभाजन, रक्तपात और शरारती पड़ोसी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत पुनः गणतंत्र बना।हमने इन 64 वर्षों में अनेक आंधी-तूफानों का सफलतापूर्वक सामना किया है लेकिन दुर्भाग्यवश आज़ाद भारत आज तक गण और तंत्र के बीच समन्वय नहीं बिठा सका है और जब तक गण और तंत्र के बीच समन्वय नहीं होगा तब तक गण के लिए इस राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस का महत्व भी समझ से परे होगा।

हाल ही में सीमा पर शहीद हुए देश के दो बहादुर लाल(लांस नाइक वीर हेमराज एवं सुधाकर सिंह) इस गणतंत्र में गण की शक्ति,प्रतिभा और समर्पण की मिसाल है जिनका क़र्ज़ हम तमाम भारतवासी कभी भी पूरा नहीं कर पायेंगे। नमन करते हैं तुझको एवं उन तमाम धरती पुत्रों की जिन्होंने अपनी जननी और जन्मभूमि की शान बढ़ाई है। गणतंत्र की महत्ता समझनी है है इनके निस्वार्थ वलिदान को महसूस करे अर्थ स्वतः ही आपका आलिंगन करेंगे।जय जवान,जय किसान से जय विज्ञान तक इस देश के तंत्र की नहीं बल्कि ‘गण’ की महिमा है,जो आज संपूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा का श्रोत है। अस्त्र शस्त्र का भारी भरकम बेडा और सूचना प्रौद्योगिकी में प्रगति इत्यादि इसके साक्ष्य है।संविधान,कानून, नियम,उप नियम और संविधान में संशोधनों का कारण एक ही है। तंत्र चाहता है कि गण हर हाल में व्यवस्था को सुचारू बनाए। अगर हम तंत्र की इस धारणा को समझते हुए आत्मसात करें तो कानून के साथ उप कानून और नियम के साथ उप नियम की जरूरत नहीं होगी। जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम अपने कर्तव्यों की पालना शुरू कर दें। पर प्रश्न यह है की इस कर्त्तव्य रुपी झंडे को कौन फहराएगा? कौन इस परेड की सलामी लेगा? और कौन इस समारोह में मुख्य अतिथि होगा? - गणतंत्र के तमाम गण या सिर्फ राजनीतिज्ञ?

आदर्श रूप में गणतंत्र में गण और तंत्र के बीच समन्वय बिठाने की जिम्मेदारी राजनीतिज्ञों की होती है लेकिन हमारे देश की राजनीती अभी भी राजतंत्र वाली होती है प्रजातंत्र वाली नहीं। ये हमारी राजनीतिज्ञों द्वारा की जा रही ता ता थैया से समझी जा सकती है। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ तल्ख टिप्पणी की और यहाँ तक कह दिया की अब मैं क्या करूं? क्या मैं पीएम को मारूं? राज्य में कम वजन और कुपोषण के कारण नवजात शिशुओं की मौत के बढ़ते आंकड़े का जिक्र करते हुए उन्होंने एक और विवादास्पद व्यान दिया की पड़ोसी राज्य बिहार से ज्यादा संख्या में मरीजों का आना एक समस्या बन गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, 'आप जानते हैं हमारी समस्या क्या है? बिहार से कई लोग इलाज के लिए अपने बच्चों को लेकर पश्चिम बंगाल के जिलों मालदा और मुर्शिदाबाद के अस्पतालों में आते हैं।' हाल की एक और घटना है जिसमे महाराष्ट्र के जाने माने राजनीतिज्ञ राज ठाकरे ने कहा की बिहारी बलात्कारी होते है। गणतंत्र में केंद्र अगर घर है तो राज्य इसके कमरे और केंद्र की जिम्मेदारी समूचे घर की देखभाल करने की है एवं राज्य की जिम्मेदारी कमरे और इसमें  रहने वाले गण की देखभाल की है। लेकिन आज तक हम राजतन्त्र या गुलामी के फोर्मुले को भूल नहीं पाए है। वही फुट डालो राज करो नीति को अपनाकर गौरवान्वित हो रहे है। राज्यों को देश का हिस्सा नहीं वल्कि एक अलग मुल्क की तरह देखा जा रहा है। फुट डालो राज करो की नीति असुरक्षित वातावरण का संकेत होता है जहाँ पॉवर स्ट्रगल में गण से लेकर तंत्र तक असुरक्षित होता है और सब एक दुसरे के दुश्मन प्रतीत होते है। ऐसी राजनीती में हम एक समृद्ध गणराज्य की कैसे कल्पना कर सकते है? किसी भी देश के विकास में तंत्र के साथ साथ गण का एकजुट होना भी आवश्यक है। लेकिन प्रजातंत्र को राजतन्त्र के चश्मे से देखकर परिचालन करना न राजनीती के लिए स्वास्थ्यवर्धक है और न ही राजनीतिज्ञ के लिए। जनता ‘मालिक’ नहीं, ‘नौकर’ बनी दिन-काट रही है क्योंकि उसके लिए बने अस्पतालों में इलाज के नाम पर लम्बी लाइनें तो हैं लेकिन रोगी के लिए बिस्तर, बैड भी नहीं है। रेल के डिब्बे में पैर रखने की जगह नहीं एवं बसों में भी बेबसी का आलम है और उस पर BUY 1 GET 1 OFFER के तहत देश के भीतर ही अप्रवासी होने का लांक्षण भी।संबिधान को लागु हुए 64 वर्ष हो चुके है लेकिन आज भी औसतन 50-60% लोग ही वोट देते है। विश्व के सातवें सबसे बड़े लोकतंत्र में आधी आबादी के मत के वगैर लोकतंत्र का परिचालन एक दक्ष गणतंत्र की परिभाषा वयां करने में सक्षम है। भ्रष्टाचार,महिला के सुरक्षा सम्बन्धी कानून के मुद्दे इत्यादि आज के स्वतंत्र मीडिया वाले युग में मनोरंजन मात्र है। भ्रष्टाचार और कालेधन पर खूब बढ़-चढ़कर बातें करते करने वाले क्या इतना भी नहीं जानते कि यह ‘तंत्र’ की निष्क्रियता अथवा मिली भगत के बिना संभव नहीं है। यह तंत्र और नियमों की असफलता नहीं तो और क्या है?

अगर परिवर्तन ही इसका हल है तो वो परिवर्तन भारतीय राजनीती में होनी चाहिए। राजनीती का स्वरुप ऐसा हो,राजनीती की नियत ऐसी हो जिसका उद्देश्य मात्र सत्ता हासिल करना न हो वल्कि इसके साथ साथ प्रजा के लिए सामाजिक,आर्थिक,बौद्धिक एवं मनोवैज्ञानिक विकास का भी संकल्प हो और असफल होने पर सत्ताधारी राजनितिक पार्टी या उनके समूह की उत्तरदायित्व भी तय की जाये। फिर देखिये गण और तंत्र के बीच संघर्षविराम कैसे होता है..

आप सभी को गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर अनंत शुभकामनाये…HAPPY REPUBLIC DAY….जय हिन्द..:-)

Wednesday, January 23, 2013

मिनिमम इन मैक्सिमम सिटी

पिछले कुछ दिनों से रात में मैक्सिमम सिटी का पारा गिरकर 13-16 के इर्द गिर्द घूम रहा है और सर्द हवाएं लोगो को गर्मी में भी सर्दी के एहसास करा रही है। मैं भी इन सर्द हवाओं के चपेट में ताप को झेल रहा हूँ पर गिरते नही चढ़ते ताप का!! यहाँ ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सूर्य की किरणे सर्द हवाओं का बहिष्कार कर रही है और रात की मध्यम सर्द हवाए सूर्य की गर्मी का खूब मजाक उडा रही हो। पौष आने वाला माघ से नजरे चार कर रहा है और वसंत इनकी आशिक़ी देख इर्ष्या की अग्नि में जल रही है। ऋतुए जब बदल रही होती है तब ऐसी अस्थिरता आम बात है वैसे ऋतुराज वसंत का माघ महीने की शुक्ल पंचमी(बस अगले कुछ ही हफ्तों में) से आरंभ होता है। इस ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है। मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। आम बौरों से लद जाते हैं और खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है.

वैसे तो इस मैक्सिमम सिटी में ज्यादातर परिस्थितियाँ मैक्सिमम ही है लेकिन जो सबसे मिनिमम है वो है सर्दी और मैं तपते शरीर से इन्ही सर्द हवाओं को महसूस करने मैक्सिमम सिटी की उस सड़क पे निकला जहाँ से गर्व,घमंड,चंचलता,ख्वाब,संयम,सुन्दरता,कामुकता,तीब्रता,व्याकुलता एवं अनंत बहुत साफ़ साफ़ दिखाई देती है। सर्द हवाओं के साथ धीरे धीरे स्याह होता नीला गगन और उस पर एशिया की सबसे अमीर मानी जाने वाली नगरपालिका की प्रकाश-पुंज द्वारा अंधियारे और उजाले की बीच की ये प्रतियोगिता जिसकी हार और जीत का अंजाम सिर्फ इन्हें ही मालूम है देखते नहीं बन रही थी। यह वही प्रकाश पुंज है,यह वही ख्वाब है,यह वही तीब्रता,यह वही व्याकुलता है और यह वही अनंत है जहाँ लोग जीने की तमन्ना भी रखते है और मरने का इरादा भी। इस मैक्सिमम सिटी का यही वो सूक्ष्म रास्ता है जहाँ भारत की गरीबी बहुत धुंधली और इंडिया की विलासिता बिलकुल स्पष्ट दिखाई देती है। वैसे तो लोग तपती शरीर में सर्द हवाओं से परहेज किया करते है लेकिन कल मेरी इस तपती शरीर को इन सर्द हवाओं से जो शुकून मिला वो शायद पिछले 2-3 दिनों में औषधियों से भी नहीं मिली थी।चकाचौंध रौशनी में तेज रफ़्तार से दौड़ती रंग बिरंगी गाड़ियों के शोर में भी शुकून और संयम महसूस हो रहा था। शरीर में सांस ही क्रियाशील जिंदगी की सूचक होती है और कल की ये सर्द हवाएं तपती शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह कर रही थी। अरब सागर की ओर निहारती इस सुक्ष्म रास्ते की ऊँची ऊँची बहुमंजिली इमारत इमारत नहीं वल्कि इस मैक्सिमम सिटी का गर्व है,घमंड है और ऊँचा होने की विरासत भी। शायद इसी लिए यहाँ से गुजरती सर्द हवाएं भी मेरी तपती शरीर को अपनी हैसियत के बलबूते आराम पंहुचा रही थी। सार्वलौकिक सोच में मदमस्त यहाँ के सैलानी,मोहब्बत के अनुयायी युवक दल और नीरस बुढापे में जिंदगी की रस बरक़रार रखने को प्रयत्नशील बुजुर्ग जोड़े जिंदगी जी लेने की अजब लेकिन गजब प्रेरणा देती है। लगभग डेढ़ घंटे की चहलकदमी से उर्जावान होकर अब मेरा तपता शरीर पूरी तरह से थक चूका था और फिर क्या बस निकल पड़ा अपने आशियाने की तरफ रात्रि विश्राम के लिए। अब ट्रेन की तेज रफ़्तार के आगे ऊँची ऊँची इमारते आँखों से ओझल होती जा रही थी और इसी मध्य अनायास एक FM रेडियो चैनल द्वारा प्रस्तुत ये गीत.....It made my day......समय के किसी पड़ाव पर अगर ख्वाब और हकीक़त दो अलग अलग रास्ते चल रहे हो तो ऊँची और भडकदार इमारतों की उदासी और खामोश सागर की शक्लो सूरत देख इस सोंच को बहुत उर्जा मिलती है शायद ऊँचा बनना और ऊँचा दीदार करना दोनों ही जरूरी है इस जिंदगी में,आखर दोनों एक दुसरे को प्रेरित करने में संपूरक जो है...

ओ रे मनवा तू तो बावरा है
तू ही जाने तू क्या सोचता है बावरे
क्यूँ दिखाए सपने तू सोते जागते
जो बरसें सपने बूँद बूँद
नैनों को मूँद मूँद
कैसे मैं चलूँ ,देख न सकूँ
अनजाने रास्ते
गूँजा-सा है कोई इकतारा..:-)

Sunday, January 20, 2013

Its RE-SEARCH(रि-सर्च)-लेडीज एंड जेंटलमेन

एक प्रसिद्ध,पवित्र एवं पूज्यनीय धर्मग्रन्थ बाइबल के अनुसार परमेश्वर ने पुरे ब्रह्माण्ड को सात दिनों में बनाया था और आज मैं इस आलेख का प्रारंभ इसी में वर्णित कुछ अंशों के साथ कर रहा हूँ।
सर्वप्रथम परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया। पृथ्वी बेडौल और सुनसान थी। धरती पर कुछ भी नहीं था। तब परमेश्वर ने कहा उजियाला हो और उजियाला हो गया। फिर परमेश्वर ने उजियाले को अन्धकार से अलग किया और उजियाले को दिन और अंधियारे का नाम रात रखा। शाम हुई और फिर सवेरा हुआ। यह पहला दिन था।
दुसरे दिन परमेश्वर वायुमंडल बनाया और जल को अलग किया,कुछ जल वायुमंडल के ऊपर था और कुछ जल वायुमंडल के निचे। परमेश्वर ने वायुमंडल को आकाश कहा!
तीसरे दिन परमेश्वर ने पृथ्वी के जल को एक जगह इकट्ठा किया जिससे सुखी भूमि दिखाई दे और सुखी भूमि का नाम पृथ्वी रखा और जो जल अलग किया था उसका नाम समुद्र रखा। फिर पृथ्वी घास,पौधे जो अन्न उत्पन्न करते है और फलो के पेड़ उगाये। फलो के पेड़ ऐसे जिनके अन्दर बीज हो और हर एक पौधा अपनी जाती का बीज बनाए।
चौथे दिन परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनाई। परमेश्वर ने उनमे से बड़ी ज्योति को दिन पर राज्य करने के लिए बनाया और छोटी ज्योति को रात पर राज्य करने के लिए बनाया और इसके साथ साथ परमेश्वर ने तारे भी बनाए। पांचवे दिन जल के अनेक जलचरो और पक्षियों को उत्पन्न किया और इनको आशीष दिया की बहुत सारे बच्चे उत्पन्न करो।
छठे दिन परमेश्वर ने कहा पृथ्वी हरेक जाती के जीव-जंतु उत्पन्न करे। हर जाती के जानवर और छोटे रेंगने वाले जानवर हो और यह जानवर अपने जाति के अनुसार और जानवर बनाए। तब परमेश्वर ने कहा अब हम मनुष्य बनाएं। हम मनुष्य को अपने स्वरुप के जैसा बनायेंगे और यह हमारी तरह होगा। वह समुद्र की समस्त मछलियों,आकाश के पक्षियों और सभी जानवरों और रेंगने वाले जीवों पर राज करेगा। तब परमेश्वर ने पृथ्वी से धुल उठायी और मनुष्य को बनाया और फिर मनुष्य के नाक में जीवन की सांस फूँकी और इस तरह मनुष्य एक जीवित प्राणी बन गया। फिर परमेश्वर ने अदन नामक जगह में बाग़ बनाया और परमेश्वर ने अपने बनाए मनुष्य को इसी बाग़ में रखा। परमेश्वर ने प्रत्येक सुन्दर पेड़ और भोजन के लिए सभी अच्छे पेड़ों को इस बाग़ में उगाया। इसी बाग़ के मध्य में परमेश्वर ने जीवन के पेड़ को रखा और उस पेड़ को भी रखा जो अछे और बुरे की जानकारी देता है। मनुष्य का काम पेड़-पौधे लगाना और बाग़ की देखभाल करना था। परमेश्वर ने मनुष्य को यह आज्ञां दी की तुम इस बगीचे के सभी पेड़ के फल खा सकते हो लेकिन अछे और बुरे की जानकारी देने वाले पेड़ का फल नहीं खा सकते यदि तुमने इस पेड़ का फल खा लिया तो तुम मर जाओगे। तब परमेश्वर ने माना की मनुष्य का अकेला रहना ठीक नहीं है और कहा की इसके लिए उपयुक्त सहायक बनाऊंगा और फिर परमेश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो रहा था तो परमेश्वर ने मनुष्य के शारीर से एक पसली निकाल ली और फिर इस त्वचा को बंद कर दिया और जहाँ से उसने पसली निकाली थी। और इस तरह मनुष्य के पसली से स्त्री की रचना की और फिर परमेश्वर ने मनुष्य को स्त्री के पास लाया और मनुष्य ने कहा अंततः हमारे सामान एक व्यक्ति। इसकी हड्डियां मेरी हड्डियों से आई,इसका शारीर मेरे शारीर से आया और इसलिए मैं इसे स्त्री कहूँगा। यह छठवां दिन था।
अंततः सातवे दिन परमेश्वर ने अपने काम को पूरा कर विश्राम किया।
स्त्री की उत्पत्ति नहीं हुई वल्कि इसकी रचना की गयी है। इस परिकल्पना को हमारे समाज के अन्य प्रसिद्ध,पवित्र एवं पूज्यनीय धर्मग्रंथो एवं साहित्य ने कुछ ऐसे  ही मिलते जुलते रूप में वर्णन किया है ....
  • जाओ वैदेही तुम मुझ से मुक्त हो, जो करना है मैंने किया, मैंने रावण से युद्ध अपने राज्य और शासन से कलंक मिटाने के लिए किया। मुझे पतिरूप में पाकर तुम ज़राग्रस्त न हो इसीलिये मैंने रावण का वध किया, मेरे जैसा धर्म बुद्धि संपन्न व्यक्ति दूसरे के हाथ में आई स्त्री को एक क्षण के लिए भी कैसे ग्रहण कर पायेगा। तुम सच्चरित्र हो या दुश्चरित्र मैं तुम्हारा भोग नहीं कर सकता मैथिलि। { रामायण - राम सीता संवाद - ३/२७५/१०-१३}
मैथिली शरण गुप्त ने लिखा था कि:
  • अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,आंचल में है दूध और आंखों में पानी।
पवित्र क़ुरान में लिखा है :-
  • मनुष्य को चाहत की चीज़ों से प्रेम शोभायमान प्रतीत होता है कि वे स्त्रियां, बेटे, सोने-चांदी के ढेर और निशान लगे हुए घोड़े हैं और चौपाए और खेती. यह सब सांसारिक जीवन की सामग्री है...[कुरआन 3:4]
" भोजन खाकर स्त्री को जूठा देना" { गृहसूत्र १/४/११} { यह प्रथा बंगाल में आज भी है }

मतलब बिलकुल स्पष्ट है इस ब्रह्माण्ड की रचना ही पितृसत्तात्मक समाज से हुई है जिसमे मानव समूदायों का नेतृत्व पुरुष करता है। सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। और शायद यही वो कारण जिसने स्त्रियों को समाज में ऐसे जगह पे रखा हुआ है। साहित्य को और खंगालने पर कुछ ऐसे ही और प्रमाण मिलते है जो पितृसत्तात्मक समाज की मनमानियां वयां करती है। कहते है शब्द ही ब्रह्म है और ये शब्द भी कम अपराधी नहीं है जिसने साहित्यकारों को स्त्रियों को एक पूर्ति साधन वाली वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने में बढ़ चढ़ कर मदद की। स्त्री को भिन्न भिन्न शब्दों से संबोधन एवं वर्गों में बांटा जाना उसके पतन और शोषण नहीं तो क्या है....
नारी - नारी शब्द नृ अथवा नर शब्द से बना है......
पुत्री- यह पुत्र शब्द का स्त्रीलिंग रूप है पुत्रका या पुत्रिका प्रयोग भी कही-कहीं मिलता है ।
सुता- पुत्री को सुता भी कहते है सु धातु से क्त प्रत्यय करने पर सुता रूप बनता है जिसका अर्थ है उत्पादित या पैदा किया गया
बाला - सोलह वर्ष से कम आयु की युवती को बाला कहते हैं यह शब्द भी कन्या का प्रर्याय है बाला का एक अर्थ अवयस्का या तरूणी भी होता है बाला को बालिका भी कहते हैं
युवती - वह स्त्री जिसे यौवन प्राप्त हो। तुलसी ने कहा है दीप सिखा सम जुवती तन......
तरुणी- जवान स्त्री को तरूणी कहते हैं,
मध्यमिका -विवाह योग्य वयस्क कन्या को मध्यमिका या मध्यमा कहते हैं
दुहिता - कन्या को दुहिता भी कहा जाता है एंगलो सेक्शन का दोहतार,अंग्रेजी का डाटर,जर्मन का तोखतर,ग्रीक का धुगदर ये सभी शब्द किसी न किसी रूप मे नाता रखते हैं।बेटी का नाता अंतरर्राष्ट्रीय है....माता की तरह ही...दुहिता वह भी है...जिसे दुतकारा जाए।
अबला- इस शब्द की रचना नारी के शारीरिक बल को ध्यान मे रख कर की गई है क्यो कि स्त्री मे पुरूष जैसा बल नहीं होता है।
मोहिनी - मन को हरने वाली स्त्री को मोहिनी कहते हैं...समुद्र मंथन में मिले अमृत के लिए जब युद्ध हुआ तो राक्षसों को ठगने के लिए विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था।
पत्नी –पत्नी के लिए सहचरी, सखी ,सहचारिणी सहधर्मिणी शब्द का भी व्यवहार मिलता है। पत्नी सुख दुख की साथी होती है इसलिए सखी है जीवन के हर डगर पर
पुरूष के साथ चलने वाली है इसलिए सहचरी है पुरूष के धर्म कर्म मे साझेदार है इसलिए सहधर्मिणी है।
गृहणी - पत्नी घर के कार्यभार सभालती है इसलिए गृहणी है गृहणी यानी घरनी....किसी ने कहा है...बिन घरनी घर भूत का डेरा ।
प्रियतमा ,प्रेयसी - पत्नी पुरूष को प्रिय होती है इसलिए उसे प्रियतमा या प्रेयसी का सम्बोधन भी मिलता है।
वधु,वधूका,वधू ,वधूरी-स्त्री पिता के घर से मान सम्मान,धन सम्पति का पति गृह तक वहन करती है, इसलिए वघू कहलाती है । वघू शब्द पत्नी ,पुत्रवधू ,युवती इन सभी अर्थों में प्रयुक्त हुआ है । वघूरी शब्द का प्रयोग तरूणी स्त्री के लिए होता है।
महिला- इस शब्द मह का अर्थ पूजा है..यह शब्द स्त्री की महिमा दर्शाता है। महानता, महान, महीयसी, महा, महत्तर जैसे तमाम प्रधानता स्थापित करनेवाले भावों के समेटे हुए शब्दों का जन्म भी उसी मह् से हुआ है जिससे महिला शब्द बना है। इसी शब्द में उस युग की छाया नजर आती है जब पृथ्वी पर मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी  थी।
धर्मग्रन्थ,साहित्य से हटकर अब थोडा विज्ञान और मनोविज्ञान की नजर में पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री को देखने की कोशिश करते है। मनुष्य यौन क्रियाओं द्वारा खुद को पुनः उत्पन्न करता है। पर जब बात सेक्स मतभेद पर आती है तो महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं और पुरुषों प्रजनन में अलग-अलग भूमिका निभाते हैं, और यह सिर्फ एक शारीरिक बात नहीं है.प्रजनन की सामाजिक लागत दोनों महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग अलग हैं, और मानव जाति के विकास के दौरान इन्ही कारको ने पुरुषों और महिलाओं में एक लाभ भरा सोच, बर्ताव और महसूस करने के विभिन्न तरीकों को विकसित किया।परिणामस्वरूप पुरुषो ने अपने जीन(Gene) को कायम रखने की प्रयास के कई पैमाने रखे जिनमे से शादी के लिए रंग रूप के साथ साथ अपने से कम उम्र की महिला प्रमुख है।यह कोई विशेष सामाजिक मज़बूरी या अनिवार्यता नहीं है बल्कि कम उम्र स्त्री के स्वस्थ प्रजनन क्षमता के आशुलिपि संकेतक है ताकि उनका आने वाला वारिस स्वस्थ हो। पुरुषो की तरह स्त्रियों ने भी अस्तित्व की सुरक्षा के ध्यान में रखते हुए अपने भावी पति के कुछ पैमाने रखे जिसमे रंग,रूप और शारीरिक पुष्टता से ज्यादा तबज्जो अर्थ-धन को दी गयी है।इस सोच के कई तर्क और कारण है और इन्ही में एक है संभावित जीवन साथी और उनके वंश के लिए प्रजनन में गर्भावस्था के नौ महीने में महिलाओं के उनके हिस्से के लिए समय और प्रयास के निवेश की अधिकता और यही वजह है महिलाएं खुद की तुलना में अमीर जीवन साथी पसंद करते हैं.
सामाजिक परिकल्पना वाले व्यवस्था में जीवन साथी शब्द और उसमे उत्पादन,लागत जैसे वाणिज्यिक गतिविधियों का समावेश ने स्वार्थी भाव जैसे एक गंभीर विकृति का जन्म दिया और यही सोच आज तक कायम है जो स्त्री पुरुष के मतभेद और मनभेद दोनों को संजो कर रखे हुए है। यही वो विकृति है जो पितृसत्तात्मक समाज को अपने वजूद की असुरक्षा का भय महिलाओं पर दबंगई दिखाने को मजबूर करता है। बायोलोजिकल व जनेन्द्रियों की भिन्नता तो सर्वविदित है। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में इन भिन्नताओं की भुमिका नगण्य है। कुछ फर्क हार्मोन्स का भी रहता है लेकिन हर्मोन्स का अन्तर व्यक्तित्व के संवर्द्धन में नगण्य सा ही भूमिका अदा कर पाता है। महिलाओं को कोमलांगी कहा जाता रहा है। कोमलांगी शब्द पाषाण युग में सही था। क्योंकि उस योग में शारीरिक पुष्टता ही शक्ति का मापदण्ड होती थी। लेकिन आज के इस युग में शक्ति,विकाश,सफलता एवं खुशहाल जिंदगी के मंत्र अलग हो गए है और आज शारीरिक पुष्टता आरक्षण के श्रेणी में महादलित के जैसा है,आज शक्ति का घोतक है आपका ज्ञान,स्वस्थ विकासशील सोच। किसी गुरु की विशिष्टता अथवा किसी पारलौकिक देवी से किसी स्त्री का आवरण बना कर उसे पूज्य बनाना,स्त्री के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करना कि "वेश्या के घर की मिटटी मिलाकर दुर्गा की मूर्ति बनती है" पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री के प्रति दोमुही राजनीती एवं छलावा है जो पितृसत्तात्मक संस्कृति के स्त्री की बहुआयामी अस्तित्व और उपयोग का रिवाज प्रस्तुत करती है। आज हमारे समाज को जिस व्याधि से हर रोज शर्मशार होना पड़ रहा है उसको क़ानूनी लफ्जो में हमारे देश में रेप और अमेरिका में फोर्सिबल रेप कहा जाता है,ये दो नाम पितृसत्तात्मक संस्कृति-समाज का हिस्सा है जो इस समाज का तब तक असाध्य रोग बना रहेगा जब तक इसे सत्ता,अधिकार और मिलकियत से जोड़ा जाता रहेगा।
स्त्री शब्द के मूल में संस्कृत की स्त्यै धातु है। यह समूहवाची शब्द है जिसमें ढेर, संचय, घनीभूत, स्थूल आदि भाव शामिल हैं। इसके अलावा कोमल, मृदुल, स्निग्ध आदि भाव भी निहित हैं। गौर करें कि स्त्री ही है जो मानव जीवन को धारण करती है। सूक्ष्म अणुओं को अपनी कोख में धारण करती है। उनका संचय करती है। नर और नारी में केवल नारी के पास ही वह कोश रहता है जहां ईश्वरीय जीवन का सृजन होता है। उसे ही कोख कहते हैं और कोख में ही जीवन के कारक अणुओं का भंडार होता है। वहीं पर वे स्थूल रूप धारण करते हैं। गर्भ में सृष्टि-सृजन का स्निग्ध, मृदुल, कोमल स्पर्श उसे मातृत्व का सुख प्रदान करता है। गौर करें कि संस्कृत में किसी भी जीव के पूरक पात्र अर्थात मादा के लिए स्त्री शब्द है क्योंकि नए जीव की सृष्टि का अनोखा गुण उसी के पास है। इसीलिए वह मातृशक्ति है, इसीलिए वह स्त्री है न की कोई और वजह
कहानियाँ जो भी हो या मतलब जो भी निकाले परन्तु सत्य तो यही है की स्त्री और परुष दोनों ही परमेश्वर की उत्पत्ति है और यह अपने आप में एक दुसरे यानी - इंसानों के प्रति अच्छे रिश्ते के उद्देश्य के लिए हुई है। स्त्री और पुरुषो को एक दुसरे के विपरीत आकर्षण शारीरिक 'भिन्नता' है और 'प्रकृति' भी और यह सत्ता,अधिकार और मिलकियत की मोहताज नहीं है। गौर करे तो आज से एक पीढ़ी पहले तक औसत परिवार का अकार 3 या उससे अधिक हुआ करता था- कारण था सस्ती जीवन यापन और भयानक म्रत्यु दर लेकिन महंगाई में लगातार वृद्धि,कठिन होती जीवन यापन और म्रत्यु दर में सुधार ने औसत परिवार का अकार तक़रीबन 2 तक सीमित कर दिया ठीक इसी तरह समय इस नीरस पितृसत्तात्मक समाज का उपचार भी ढूंढ़ लेगा,यकीं रखे,वो दिन दूर नहीं है जब पितृसत्तात्मक समाज अपने नए अवतार मातृ-पितृसत्तात्मक समाज के रूप में दिखाई देगा।


Wednesday, January 9, 2013

सुर्ख वाला,सौज़ वाला भारतीय प्रजातंत्र में 2013 के टॉप फाईब शुरूआती झटके...


सुर्ख वाला,सौज़ वाला भारतीय प्रजातंत्र में 2013 के टॉप फाईब शुरूआती झटके...:-)
  1. जब कोई लड़का किसी लड़की को छेड़े या बलात्कार करे तो लडकी को गिडगिडा कर बलात्कारी को भाई बना लेना चाहिए,इससे लड़की की ज्यादा दुर्दशा नहीं होगी :- संत श्री श्री 100008 निराशा राम - बापू के लायक नही
  2. बिहारी यानी बलात्कारी :- माननीय श्री नाराज़- ठहाकारे
  3. पाकिस्तान के अनुसार हमारे दो जाँबाज जवानो की मृत्यु उनके हमले से नहीं वल्कि आत्महत्या है / वे निर्दोष है:- अमन की आशा लेकिन हाथ लगी निराशा,बंद करो ये सब तमाशा
  4. रेल किराये में करीब 20 प्रतिशत तक की वृद्धि की है। यात्री रेल किराया दस साल में पहली बार बढ़ोतरी की गई है। :- कहाँ गए रे स/ब 
  5. पेट्रोलियम वस्तुओं का दाम नहीं बढ़ाने से सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा,जिससे बजट पर दबाव बढ़ेगा, सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं पर खर्च करने के लिये संसाधन कम होंगे तथा तेल कंपनियों की स्थिति और खराब होगी। चरणवद्ध तरीके से मूल्य वृद्धि :-  नो गीव बट टेक सिंह- दिवालिया 

Thursday, December 20, 2012

पुरुष- पशु या भर्तार?

हाल ही में दिल्ली में चलती बस में फिजियोथेरेपिस्ट के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की घटना हृदय विदारक,शर्मनाक और दुखद है और यह साबित करता है कि हममें इंसानियत का स्तर कितना नीचे गिर चूका है?अब वह समय आ गया है कि हमारे देश में भी सऊदी अरब जैसे कानून लागू किए जाएं। पुरुष स्वभाव से पशु होता है इस वैज्ञानिक सत्य को आज दिल्ली की इस घटना ने प्रमाणित कर दिया है।यह एक सामाजिक आतंकवाद जैसा है जो सड़ी हुई पुरुष प्रधान सोंच से उत्पन्न हुई है और अगर इस पर शीघ्र नकेल नहीं कसी गयी तो यह पुरे समाज को अपनी चपेट में लेकर अघात करता रहेगा और ऐसे लोगो की सजा जैसे को तैसा आधार पे सुनश्चित की जानी चाहिए। मुझमे इस विषय पर इससे अधिक बोलने की हिम्मत नहीं है।

आधुनिकता की अगुआई में आज हमारा भारत कई परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है। बढती आमदनी,शिक्षा का स्तर,मीडिया का प्रभाव,एवं कठिन होती जीवन यापन की शैली ने लोगो के पास एक ही विकल्प दे रखा है और वो है प्रवर्जन। छोटे शहरों से सार्वलौकिक(Cosmopolitan)शहरों में प्रवर्जन आज के दौर में एक क्रांति है जो नए एवं अत्याधुनिक भारत की एक अलग तस्वीर भी प्रस्तुत करती है वही दूसरी ओर विशाल जनसँख्या होने के नाते सामाजिक विषमताओं का संक्रमण पुरे समाज को बीमार करता जा रहा है। सोंच और शिक्षा आपस में सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा है और परिणामस्वरूप आज मौज-मस्ती,मनोरंजन अपराध का रूप ले रहा है।इस प्रकार की सामाजित विकृति एक ऐसी महामारी है जो विज्ञान के साथ साथ प्रकृति को भी खुलेआम चुनौती दे रहा है एवं स्पष्ट रूप से मनुष्य के अस्तित्व को विनाश की ओर धकेल रहा है। व्यवस्था परिवर्तन से ज्यादा महत्वपूर्ण है अपनी सोच और अपनी शिक्षा के मध्य सामंजस्य का प्रवाह कराना। छोटे शहरों से सार्वलौकिक(Cosmopolitan) शहरों में जब लोग आते है तो उनका सामना एक अपरिचित संस्कृति से होता है। परदे में लिपटे माहौल में पले बढे लोगो के लिए पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित महिलाओं के लिबास और शहर की उदार मानसिकता देख उनके पुरुष प्रधान समाज वाली सड़ी हुई मानसिकता को एक सांस्कृतिक धक्का/झटका लगता है और यह धक्का/झटका/सदमा सोंच और शिक्षा के मध्य सामंजस्य की आभाव वाली मस्तिस्क को अपराधिक सोच में तब्दील कर देती है। इस तरह के एक अपरिचित संस्कृति से उत्पन्न होने वाले संस्कृति सदमे को रोकने के लिए वैज्ञानिक तौर पर कोई ठोस उपाय नहीं है, इसका उपाय सिर्फ और सिर्फ सोंच और शिक्षा का सामंजस्य वाला मस्तिस्क ही हो सकता है जो इस तरह के सांस्कृतिक विरोधाभासों के दुष्प्रभाव को सकारात्मक रूप में स्वीकार कर सके.मैं भी एक छोटे शहर से हूँ फिर भी मुझे इसे लिखते हुए कोई तकलीफ नहीं हो रही है...अगर छोटे शहरों के लोग अपनी इस मानसिकता से बाहर नहीं निकल सकते तो आप सार्वलौकिक(Cosmopolitan)शहरों में प्रवर्जन ना करें। यह आपके और समस्त समाज के लिए हितकारी होगा। छोटे शहरों के लोगों को यह बात अच्छी नहीं लग रही हो या उनकी भावनाओं को ठेस पंहुचा हो तो मैं क्षमा मांगता हूँ लेकिन सोंच,शिक्षा और मानसिकता की दूरी मिटाए बिना एक सुरक्षित समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता और इस बात से आप सभी को सहमत भी होनी चाहिए।

दूसरी तरफ आज की गैर जिम्मेदार फिल्म्स भी सोंच,शिक्षा और मानसिकता की विकृति में अग्नि उद्दीपन का कार्य कर रही है । आज समाज में फैल रही अश्लीलता और अपराध को सर्वाधिक रास्ता दिखा रहा है यह गैरजिम्मेदार फिल्म्स। इससे युवा पीढ़ी पर होने वाले गलत असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षो पे निगाह डालें तो आपको पता चलेगा की भारतीय सिनेमा में इस दौरान आइटम गीत या आइटम नंबर (मेड इन इंडिया ओनली) का प्रचलन का खूब प्रचार प्रसार हुआ है। मैं आइटम गीत या आइटम नंबर की इस लिए चर्चा कर रहा हूँ की फिल्मों में आइटम गीत या आइटम नंबर रखने का एक ही मकसद होता है...महिलाओं को आगे कर संगीत के जरिये यौन उत्तेजक भावनाओं का प्रदर्शन करना। या फिर दुसरे शब्दों में कहें तो महिलाओं को अश्लीलता के श्रृंगार में मनोरंजन के रूप में परोसना। इससे मनोरंजन कितना होता है ये तो मुझे समझ नहीं आता लेकिन यह समाज में महिलाओं की हैसियत कमजोर जरूर करती है और साथ साथ लोगो को महिलाओं के अस्तित्व को लेकर गलत सन्देश भी देती है। अक्सर आइटम गीत या आइटम नंबर का सिनेमा के कथानक से कोई सम्बन्ध नहीं होता इससे तो बस अश्लीलता परोसकर सिनेमा की विक्रय क्षमता को बढ़ाना होता है। इस तरह के सिनेमा को U/A प्रमाणपत्र तो दे दिया जाता है लेकिन महिलाओं के अस्मिता की खुलेआम प्रदर्शनी किसी को भी नजर नहीं आती? आइटम गीत या आइटम नंबर को लेकर भी कुछ सख्त नियम होने चाहिए जैसे जिस भी फिल्म में अगर यौन उत्तेजक भावनाओं से ओत प्रोत आइटम गीत हो तो उसे A फिल्म प्रमाणित किया जाना चाहिए ताकि परिपक्वता पर नियंत्रण रखा जा सके। क्योंकी विज्ञान कहता है की युवा स्त्री के मुख व शरीर से एक प्रकार के फेरोमोंस का स्राव होता है जो पुरुष हार्मोन Androgen के लिए उद्दीपक का काम करता है।ये फेरोमोंस बिना स्पर्श के ही Olfactory(घ्राण ) और Optic (दृष्टि ) तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क को सन्देश पहुचाते हैं।यह सन्देश पिटयुटरी ग्रंथि तक पहुँच कर उसे पुरुष सेक्स हार्मोन Androgen को उत्तेजित करने का आदेश देता है, जिसके फलस्वरूप पुरुष उसके प्रभाव को शांत करने के लिए स्त्री पर अनाधिकार व असामाजिक कृत्य करने पर मजबूर हो जाता है। यह एक स्वाभाविक वैज्ञानिक प्रक्रिया है तो फिर हमारी व्यवस्था,हमारी फिल्म प्रमाणन बोर्ड या हमारा समाज इस कटु सत्य को नजरंदाज क्यों करती है? अब फिल्म उद्योग को भी जिम्मेदार होना पड़ेगा? मनुष्य धरती पर पाया जाने वाला एकमात्र ऐसा जीव है जो प्रकृति द्वारा बनायी हुई रासायनिक, भौतिक, व जैविक नियमों से बंधी हुई स्वचालित मशीन (अर्थात शरीर) को अपनी मनमर्जी के मुताबिक खुद के निर्देशों पर चला सकता है.लेकिन मनुष्य अगर पशुओ जैसा व्यवहार करने लगे तो पशुओं और मनुष्यों की जीवन शैली बिलकुल एक सी हो जायेगी ..जिसमें रिश्ते-नाते,तहज़ीब,संयम और वर्जनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होगा? हमारे समाज के धर्म गुरु/पंडित चाहे जितना भी कहे की हमारे देश में स्त्रियों का बहुत मान-सम्मान होता है,उनकी पूजा की जाती है इत्यादि लेकिन हकीकत क्या है? हम सब जानते है.. स्त्रियों के प्राकृतिक स्त्र्योचित गुण और उनके मनोविज्ञान के कारण उन्हें हमेशा ही पुरूषों से हीन माना जाता रहा है। हमारे समाज में पुरुष हमेशा ही सीना तान कर चलता है वही स्त्री हमेशा झुककर? किसी ने सत्य ही कहा है की सिर्फ भौतिक समृद्धि से समाज में बराबरी संभव नहीं है, क्योंकि बराबरी के दो हिस्से हैं। एक है इक्वॅलिटी (बराबरी), चाहे वह सामाजिक हिस्सेदारी की हो या कानून की। दूसरी है रिकॉग्निशन (पहचान), जिसे हम सोशल इक्वॅलिटी(सामाजिक बराबरी) या मॉरल इक्वॅलिटी(नैतिक बराबरी) कह सकते हैं। पुरुषों को हमारे समाज ने भर्तार (भर्तार जिसका अर्थ वरण, भरण और तारण है/ हर कन्या के लिए विवाह से पहले उसका पिता और विवाहोपरांत पति भर्तार है) शब्द से नवाजा है और अगर इस प्रतिष्ठा,सम्मान को बचा कर रखना है तो पुरुषों को आत्मनियंत्रण और विज्ञान एवं मनोविज्ञान के महत्त्व को समझकर खुद और समाज के प्रति जिम्मेदार बनना होगा वर्ना अति का अंत सदैव पीड़ादायक होता है?

Thursday, December 13, 2012

दाढ़ी या लालसा


हाल ही में एक प्रमुख बाजार अनुसंधान एजेंसी द्वारा देश भर में 1000 से अधिक भारतीय महिलाओं पर एक दंपति द्वारा साझा अंतरंगता के स्तर पर शाम की छोटी छोटी दाढ़ी के प्रभाव को समझने के लिए एक सर्वेक्षण किया गया और इस अध्ययन से पता चला की महिलाएं ऐसे पुरुष को पसंद करते है जो सुबह के साथ शाम में भी शेव करते है। इस अध्यन के परिणाम को आजकल पुरे देश में 'SHAVE OR CRAVE' यानि 'दाढ़ी या लालसा' आन्दोलन के रूप में चलाया जा रहा है। कुछ समय पहले ऐसा ही एक सर्वेक्षण अमेरिका में भी हुआ था लेकिन वो पुरुषो के ऊपर किया गया था। इस अध्ययन के तहत ये बात सामने आई कि पुरुषो के मूछों का उनकी सैलरी पर बहुत असर पड़ता है। ये अध्ययन अमेरिकन मुस्टैच इंस्टीट्यूट की ओर से आयोजित कराई गई थी। अध्ययन में पता चला था कि मूंछ वाले अमेरिकन 4.3 क्लीन शेव और बिना दाढ़ी वालों से 8.2 फीसदी ज्यादा पैसे कमाते हैं। इस अध्यन से एक और मजेदार सामने आई थी कि जो लोग मूंछ रखते हैं वो बेहद खर्चीले भी होते हैं मतलब की सफाचट पुरुष कंजूस!!! गौरतलब है कि अगर ये अध्यन सही साबित हुई तो हमारे देश में 'SHAVE OR CRAVE' यानि 'दाढ़ी या लालसा' आन्दोलन की वकालत कर रहे महिलाओं को थोडा तो आघात पहुँचने वाला है।

इस पुरुष प्रधान ब्रह्माण्ड में दाढ़ी, मूंछ पुरुषों की आन और शान का प्रतीक माना जाता रहा है पर आज के आधुनिक युग में इस आन और शान का प्रतीक 
मानो भारत से गायब हो रहे बाघों की तरह आज के चेहरों से विलुप्त होने वाली प्रजाति में शामिल हो चुकी है और अगर समय रहते इसे बचाया न गया तो आपने प्रसिद्ध फिल्म शराबी का वो डाइलोग….. मूछें हो तो नत्थू लाल जैसी वर्ना न हों जैसी दाढ़ी,मूछों की महिमा का गुणगान कौन करेगा?
इतिहास पर अगर नज़र डालें तो शायद सब से पहली मूछ आदि देव शंकर जी को उपलब्ध थी। दाढ़ी,मूछें तो वास्तव में कुछ गिने चुने देवों को ही प्राप्त थी। युग धीरे धीरे बदलता रहा पर दाढ़ी,मूछों की महिमा सदा ही अपना महत्व रखती रही लेकिन आज के आधुनिक युग में इस आन,बान और शान के प्रतिक लालसा के आगे नतमस्तक होने को मजबुर है। जागो मर्दों जागो..धरोहर दांव पे लगी है। मर्दों के आन,बान और शान के प्रतिक के महिमा पर एक कवि की कविता याद आ रही जो आपको सुनाता हूँ ताकि इस धरोहर को संरक्षित करने की उर्जा मिले और इसे विलुप्त होने से बचाया जा सके....

आभूषण हैं वदन का, रक्खो मूछ सँवार,
बिना मूछ के मर्द का, जीवन है बेकार।
जीवन है बेकार, शिखण्डी जैसा लगता,
मूछदार राणा प्रताप, ही अच्छा दिखता,
कह ‘मंयक’ मूछों वाले, ही थे खरदूषण ,
सत्य वचन है मूछ, मर्द का है आभूषण।


क्लीन शेव के इस ज़माने में दाढ़ी,मूछों का प्रचलन निरंतर घट रहा है लेकिन उपयोगिता और महत्व अपनी जगह बरकरार है ..जैसे.. मेरे अनुमान से मूछें कैटेलिटिक कनवर्टर वाला एयर फ़िल्टर है, इस की मदद से अँधेरे में टटोल कर ही पता कर सकते हैं कि मर्द है कि औरत,मूछें मर्दानगी का थर्मामीटर हैं(???), दाढ़ी,मूछें साहस का संचार करती हैं। आज दाढ़ी,मूंछों को जितनी ज़िल्लत देखनी पड़ी है उतनी किसी युग में नहीं, नए युग के फैशन में जब कन्याएं जींस शर्ट पहनने लगी हैं और क्लीन शेव और लंबे बालों का प्रचलन बढ़ा है …तो देख कर सहज ही ये पहचाना भी मुश्किल हो गया है कि ये आखिर कौन सी योनि के मनुष्य है.:-) दाढ़ी,मूँछों का एक लम्बा इतिहास रहा है। पुराने ज़माने में घनी कड़कदार मूँछे पाली जाती थी जिनको मोम आदि से संवारा और दमदार बनाया जाता था। इतिहासकार बताते हैं कि मूँछों पर निंबू खडा करने की प्रतियोगिताएं भी हुआ करती थीं। अब न वैसी मूँछें दिखाई देती हैं न वैसे जवाँ मर्द! इतिहासकार यह भी बताते हैं कि मुस्लिम काल तक भारत में दाढ़ी-मूँछ का चलन अधिक रहा। अंग्रेज़ों के आगमन के साथ ही हमारी संस्कृति और सभ्यता के साथ पुरुष के चेहरे से दाढ़ी-मूँछ भी गायब होने लगे। तभी तो हैदराबाद के अंग्रेज़ रेसिडेंट किर्कपैट्रिक ने मुस्लिम नवाबों की तरह जब मूँछे रखना शुरू किया तो बात इंग्लैंड तक पहुँच गई कि कहीं वो मुसलमान तो नहीं हो गए हैं और नतीजा यह हुआ कि उन्हें इंग्लैंड लौटना पड़ा।फिल्म जगत में भी मुग़लेआज़म की अकबरी मूंछों से लेकर करण दीवान व राजकपूर कट मूँछें प्रसिद्ध हुईं।अब तो दाढ़ी-मूँछ देश या प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम पर भी जानी जाती हैं; जैसे, फ़्रेच, जर्मन या फिर लिंकन,लेनिन जैसी दाढ़ी।

मुगल शासनकाल के दौरान हेरात से रंगून तक दक्षिण एशिया में अदालत और लोगों के कपड़े पर मुगल पहनावे का प्रभाव था और चमकदार लाल तुर्की टोपी 1950 के दशक तक हॉलीवुड फिल्मों में मुसलिम पहचान का निर्धारक दृश्य हुआ करता था. जब तक कि तुर्की में सुधारवादी मुस्तफा कमाल पाशा ने इसे मध्यकालीन अतीत का प्रतीक मानते हुए बंद नहीं कर दिया. ब्रिटिश ने हमें पैंट दिया, जिसके लिए मैं खासकर उनका शुक्रगुजार हूं. यह मेरे पूर्वजों की धोती और लुंगी के मुकाबले व्यावसायिक तौर पर काफी आरामदायक है, हालांकि अब मैं एक पीड़ित की पीड़ा वयां कर रहा हूँ। ब्रिटिश ने अपने साम्राज्य और बड़े भू-भाग को ड्रेस कोड दिया. अमरीका ने भोजन दिया.यह फास्ट था,लेकिन फूड था.फास्ट लाइफ की संजीवनी.. यह लोकतंत्र और धनतंत्र के बीच बढती मित्रता का परिणाम है. ऐसा ही ब्रिटेन अपने साम्राज्यवादी दौर के समय था. ब्रिटिश खाने को विरोधाभासी कह भी सकते हैं और नहीं भी, लेकिन यह जठराग्नि के लिए डिजाइन किया गया था, ना कि स्वाद के लिए. दूसरी ओर अमरीकी कपड़े के महत्व को नहीं समझते. जींस को अमरीका का योगदान करार देना इस बात का विज्ञापन करना है लेकिंग मैं इसका प्रसार करूँगा. अमरीका ने ही अपने दौर में मोटापे के लिए दुनिया पर कब्जा करने के लिए बर्गर बनाया.आप यह बर्गर हांगकांग में पार्टी की बैठक या मक्का में हज के बाद या इलाहाबाद में गंगा स्नान के बाद खा सकते हैं. आप जहां भी जायें बर्गर आपका पीछा करता है...बिलकुल फेविकोल टाइप चिपकु ...

स्टाइल की कीमत है, इसे खरीदा जा सकता है परन्तु संस्कृति अनमोल है. संस्कृति मौजूदा आधुनिक जरूरतों, मजबूरियों या आकर्षणों से अधिक गहरी है और इसका उदहारण कोई और नहीं वल्कि हमारा भारत है.आज भी हम ज्यादातर भारतीय अपनी अंगुलियों से ही खाते हैं न की छुरी-कांटे से। दसवें गुरु गोविंद सिंह ने 'खालसा' (शुद्ध) परंपरा की स्थापना की। खालसाओं के पांच अनिवार्य लक्षण निर्धारित किये गये, जिन्हें 'पाँच कक्के' या 'पाँच ककार' कहते हैं, क्योंकि ये पाँचों लक्षण 'क' से शुरू होते हैं, जैसे- केश, कंधा, कड़ा, कच्छा और कृपाण। ये पाँचों लक्षण एक सिक्ख को विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।

क्लीन शेव रखना है या दाढ़ी मूंछ यह अपने अपने सोच पर निर्भर करता है पर लालसा के आगोश में निर्णय लेना खतरों भरा हो सकता है। सावधान..सावधान..सावधान..जागो मर्दों जागो..
 

Friday, November 23, 2012

अधिकार हो ऐसा जो बदल दे सारा इमां

अधिकारों से अपराध करे
कहते उसे न्याय
अधिकार नहीं तो हो अपराधी

अधिकारों से अपराध करे
तो दर्जा प्रेम का
अधिकार नहीं तो कहते उग्रवादी

जन संहार तो जन संहार है
अधिकारों से उसे क्या लेना
परिणाम तो एक ही है
इंसानों की जान लेना

मौत के बदले मौत
अपराध के बदले अपराध भी तो अपराध है
एक बलि क्या बदलेगी इस सोच को
जहां घात लगाये बैठा सारा जहाँ है

इंसानों ने ली है अब मौत की जिम्मेदारी
तिथि,समय निर्धारण में भी हिस्सेदारी
पसंद से चयनित होंगे अपराध
यहाँ मानव प्रेम की किसको है पड़ी
मौत दिखती है अब फुलझड़ी
कहते जान के पीछे छुपा
है जान
अपराधो की लडियां है, इसकी पहचान
बस मानव जाती का हो रहा अपमान

कहते मौत प्रकृति है
विधि का
है विधान
फिर भूलते यहाँ क्यों इसकी पहचान
अधिकार हो ऐसा

जो बदल दे सारा इमां
अपराधी,अपराधी न रहे
बन जाए इंसान...
Smiley