Negative Attitude

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Tuesday, April 15, 2014

सावधान!...

प्रतिष्ठित और बदनाम दोनों ही मशहूर होते है... उदाहरणस्वरूप,आप अगर इन पर प्रतिक्रिया इकठ्ठा करना चाहे तो सभी इसमें मशरूफ दिखेंगे,चाहे वो इनके प्रति नकारात्मक विचार रखते हो या साकारात्मक! ऑडिएंस का उत्साह दोनों के लिए लगभग एक जैसा होता है.फिर प्रश्न ये उठता है की इस कटु सत्य से वाक़िफ़ होने के बाद भी क्या इसकी सेंटीमेंट एनालिसिस करनी चाहिए? फिर भी अगर हम इसकी सेंटीमेंट एनालिसिस करते है तो इसका अर्थ ये मालूम होता है की प्रतिष्ठा पर बनावटी उबटन लगा विपणन कर प्रसिद्धि में से सिद्धि का पतन कर रहे है...

दिल्ली की राजनीतिक दुर्घटना फिर किसी भी प्रान्त में दोहराई नहीं जानी चाहिए। दिल्ली की जनता ने मीडिया के प्रोत्साहन पर झाड़ू अपनाया और झाड़ू दिल्ली की जनता की सेवा करने के वजाए राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर होने में मशरूफ है.दिल्ली आज संबैधानिक तौर पर अस्थायी व्यवस्था के अधीन जीने को मजबूर है. दूरदर्शिता और सेवा की भावना किसी संस्था से ज्यादा उससे जुड़े व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह में होता है  और  इसकी मिशाल रही है श्रीमती शीला दीक्षित जिन्होंने दिल्ली के विकास की एक अलग एवं अद्भुत दिशा प्रदान की लेकिन अपनी दिल की सुनने के वजाए वाणिज्य के चादर में लिपटे मीडिया के प्रोत्साहन पर दिल्ली के लोगो ने अपना मत व्यर्थ गंवाया और साथ साथ दिल्ली के लिए कुछ करने की सोच रखने वाली एक कर्मठ महिला को भी ? इससे कुछ और नहीं वल्कि स्वाद बदलने के चक्कर में आपका विकास का रुख बदल और रुक भी जाता है,साथ साथ आप एक ऐसे माहौल,ऐसे ज्योतिषीय योग को गँवा देते है जो कुलमिलाकर आपके धरातल के लिए फलदायी होता है. बिहार की जनता इस बात का जरूर ख़याल रखे और किसी तरह के गफलत में न पड़े,आज़ादी के बाद आज पहला ऐसा मौका है जिसमे आप बिहार के लिए जो कुछ भी अच्छा बोल या लिख गौरवान्वित महसूस कर रहे है वो सिर्फ और सिर्फ श्री नीतीश कुमार के दूरदर्शिता और सेवा की भावना का परिणाम है और अगर आप अपने वोट के जरिये इस सोच और लगन का समर्थन नहीं करेंगे तो परिणाम में व्याधि और दिल्ली जैसा हालात ही मयस्सर होगा. आप राजनीतिक संस्थाओं के संयुक्त परिवारवाद से दूर रहे,इनकी एक दूसरे के प्रति कटुता,बिखराव और मिलन एक वायरल बुखार जैसा होता है जिसमे स्वार्थ के एंटीबायटिक का कोर्स पूरा होते ही तापमान सामान्य हो जाता है.आप अपना वोट अपना,अपने समाज,अपने क्षेत्र  और अपने देश के विकास और समृद्धि को ध्यान में रख कर दे ना की प्रचार और घोषणा पत्र को देखकर,घोषणा पत्र तो राजनीतिक संस्थाओं द्वारा सार्वजनिक प्रलोभन का संवैधानिक जरिया है जो ना तो कभी पूरा होता है और ना ही पूरा करने के उद्देश्य से जारी किया जाता है! ये तो वयस्क फिल्मो के सीक्वल जैसा होता है जिसमे पहले पार्ट में पोस्टर पर अश्लीलता होगी तो दूसरे पार्ट में फिल्म में,ताकि ऑडिएंस की संख्या बड़ी हो और उनमे से ज्यादा से ज्यादा लोगो को अपने दरियादिली के सम्मोहन में फसाया जा सके?

अच्छी और प्रगतिशील सोच का समर्थन करे, चुनाव चिन्ह तो एक सुक्ष्म धागा है जो एक संस्था के घोषित आदर्शो को बाँध कर रखता है,भाषण में इस्तेमाल शब्द तो बस तत्परता के घोतक है,मतलब कहाँ है इसमें और ना ही इसकी कोई क़ानूनी महत्ता है जिसके जरिये आप ये पूछ सके की आपने ये वादा किया था और पूरा नहीं किया? वैसे दोस्तों शब्दों और उससे जुड़े मतलब को खंगाले तो ध्यान रहे... अरविन्द का समानार्थी शब्द कमल भी होता है....

ऊँगली के सहारे के बिना कलम का जोर भी फीका होता है ठीक उसी तरह वोट का असर और सदुपयोग भी इसी ऊँगली के अधीन है.… इसलिए मतदान अवश्य करे लेकिन सही सोच के साथ और किसी पार्टी या प्रत्याशी की विजय के लिए नहीं वल्कि अपनी जीत सुनिश्चित करे.…प्रजातंत्र का ससक्तिकरन इसी में निहित है!

मैं अपने गृह राज्य से बाहर परप्रांति समुदाय से ताल्लुक रखता हूँ और मेरा उद्देश्य इस आलेख के जरिये किसी व्यक्ति या संस्था को आहत करना नहीं है,मैं तो बस जन सशक्तिकरण के अधिकार अभिव्यक्ति की आज़ादी की अनुभूति करना चाहता हूँ....

Thursday, March 13, 2014

अरविन्द,कर और पुष्कर,कैसा लगा सुनकर

देखा है पहली बार चुनाव का ऐसा वयार
रागा और नमो की थाली से दोतरफा प्रचार
लड़ते दोनों ऐसे जैसे होगा महाभारत फिर एक बार
इनके थाली भले हो अलग अलग पर मुद्दे नहीं हुए तार तार
देखा है पहली बार चुनाव का ऐसा वयार
आम आदमी भी है मैदान में इस बार
सावधान, प्रचार में पीड़ा है और है महंगाई की मार
शक्लो सूरत पर मत जाना करते झाड़ू से ये अंग मार
आजकल ये भी फ़िरक़ी में हो गए है बीमार
सेटिंग का चस्का इनको भी लग गया है यार
संभल जाए नहीं तो ये सिक्स पैक्स का हाथ है
पुष्कर भी इनके साथ है,चित्त हो जायेंगे जब होगा प्रहार
अरविन्द,कर और पुष्कर,कैसा लगा सुनकर
जी आप ही को बोल रहे है,पांच साल की बात है
सोच कर बटन दबाना वर्ना हो जाएगा बंटाधार...:)



मताधिकार का प्रयोग अवश्य करे....जय हिन्द!! 

Wednesday, February 19, 2014

तेलंगाना-मैं धर्म के अनुसार जीता हूं या नहीं?

तेलंगाना बिल पर कल यानि 18 फ़रबरी 2014 (तृतीया, फाल्गुन, कृष्ण पक्ष,२०७० विक्रम सम्वत) को लोकसभा कार्यवाही का सीधा प्रसारण कार्यवाही के बीच में थोड़ी देर के लिए रुक जाना एक निंदनीय घटना माना जाना चाहिए परन्तु इसके ठीक बाद संसद से बाहर आकर गणमान्य सांसदो द्वारा संसद के भीतर का आँखों देखा हाल वयां कर हाय तौबा मचा हमारे नेतागण क्या बताने कि कोशिश कर रहे है? क्या ये यह बताने की कोशिश कर रहे की इन्हे कार्यवाही के दौरान नजरबन्द कर दिया गया था या यह अल्पकालिक व्यवस्था इनकी दोमुखी चरित्र  को ध्यान में रख कर बनाया गया था जिसमे लोकसभा कार्यवाही का सीधा प्रसारण रोकना,बिजली गुल होना एवं संसद के द्वार पर भारी मात्रा में मंत्रियो के लिए संतरियों को तैनात किया जाना आदि शामिल है. इस महंगाई प्रधान युग में जहाँ आम लोगो को रोजाना इस्तेमाल होने बाले मिर्च खरीदने से पहले महंगाई रूपी दर्द(उह-आह-आउच) को निष्प्रभावित करने के लिए मूव मरहम लगाना पड़ रहा है वहीँ जनता के नुमाइंदे ६०० रुपये प्रति किलोग्राम के मूल्य पर बिकने बाली इस महंगी पिप्पली कुल के वनस्पति काली मिर्च के चूर्ण एवं चाक़ू जैसे घातक औजार से से देश के संसद पर हमला कर रहे है... [महंगाई के असर में भी कितनी विषमता है?]  और साथ में यह भी कहते है कि हमारे लिए संतरी क्यों तैनात किया? जनाब जैसे आपकी विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार संतरी मुहैया कराती है तो आपको इन संतरियो पर कोई ऐतराज़ नहीं होता है लेकिन अब तो आपके इस कुकृत्य से संसद को खतरा है. आपने तो अब संसद को पंचायती अखाड़ा बना दिया है जहाँ संबिधान नहीं आपका आन बान शान और अभिमान का साम्राज्य चलता है ऐसे में आपसे सुरक्षित रहने के उपाय तो अपनाने ही होंगे और अगर आप इस उपाय(यानि लोकसभा  कार्यवाही का सीधा प्रसारण रोकना,बिजली गुल होना एवं संसद के द्वार पर भारी मात्रा में संतरियों की तैनाती आदि) को आपातकाल जैसे शब्द के साथ मीडिया को अपना घड़ियाली आंशु दिखाते है तो ऐसे में हमें महाभारत का एक श्लोक याद आता है ‘अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्ता’अर्थात् राजा युधिष्ठिर ने खुद को जुए में हारकर द्रौपदी को दांव पर लगाया.किसे ज्ञात नहीं की द्रोपदी का चीर हरण पुरे राजसभा के समक्ष एवं प्रतिष्ठित कौरवो और पांडवो के समस्त परिवार के माजूदगी में हुआ था पर इसको रोकने के लिए किसी भी योद्धा की शक्ति आगे नहीं आयी.याद कीजिये महाभारत का वो अध्याय जब विदुर द्वारा द्रौपदी को राजसभा में लाने से साफ मना कर देने पर दुर्योधन ने अपने एक दूत प्रातिकामी को द्रौपदी को राजसभा में लाने का आदेश दिया था। प्रातिकामी तीन बार गया परन्तु द्रौपदी ने हर बार उसे एक-एक सवाल पूछकर वापस भेज दिया। पहली बार का सवाल था,‘जाकर उस जुआरी महाराज से पूछो कि वे पहले खुद हारे थे या पहले मुझे हारे थे? और युधिष्ठिर कोई उत्तर नहीं भिजवा पाए थे । दूसरी बार द्रौपदी का सवाल कुरुवंशियों से था, ‘कुरुवंशियों से जाकर पूछो कि मुझे क्या करना चाहिए? वे जैसा आदेश देंगे, मैं वैसा करूंगी। सवाल सीधा धृतराष्ट्र और भीष्म सरीखे कुरुवंशियों से था और आदेश भी उन्हीं से मांगा जा रहा था, पर वे सब सिर नीचा किए रहे और उनके मुंह सिले रहे।हर युग के इतिहासकारों की जमात ने द्रौपदी पर आरोप लगाया की वह पांच पुरुषों की पत्नी है और इसलिए दुश्चरित्र है। परन्तु  पांच पतियों की अकेली पत्नी के रूप में द्रौपदी का आचरण् इतना आदर्श और अनुकरणीय माना गया की महाभारतकार ने उसके इस पत्नी रूप को दैवी गरिमा प्रदान कर दी और कई ऐसी कथाओं-उपकथाओं की सृष्टि अपने प्रबंधकाव्य में की जिससे द्रौपदी का जीवन दिव्य वरदानों का परिणाम नजर आए। जैसे कुन्ती के प्रणीत पुत्रों को देवताओं का आशीर्वाद बताकर गौरव से भर दिया गया, वैसे ही द्रौपदी के पांच पुरुषों (बेशक पांचों भाइयों) की पत्नी होने को भी तपस्या और वरदान का नतीजा बताकर उसे आभा से भर दिया गया। महाभारतकार और इतिहास का द्रौपदी के प्रति इससे बड़ा श्रध्दावदान और क्या हो सकता है?

आज संसद का हाल भी द्रौपदी के जैसा हो चला है,भारतीय लोकतंत्र में सत्ता रूपी जुए में पराजित या पराजित होने के भय से असुरक्षित प्रत्येक धर्मराज आज अपनी जरुरत के अनुसार संसद को दांव पर लगा अपनी राजनीति चमकाना चाहता है.अलग तेलंगाना राज्य की मंजूरी या यूँ कहे की सीमांध्र से तेलंगाना क़े तलाक पर लोकसभा कार्यवाही का सीधा प्रसारण पर अल्पकालिक रोक और बिजली गुल होना द्रौपदी के प्रश्न - मैं धर्म के अनुसार जीती गई हूं या नहीं? और इस पर भीष्म का जवाब जिसमें भीष्म बोले कि धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं कुछ बता नहीं सकता का याद दिलाता है.विपक्षी पार्टियां तेलंगाना मुद्दे पर संसद की कल की घटना पर सत्ताधारी दल की तीखी आलोचना भी कर रहे है तथा राजनीति धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण संसद के अंदर तेलंगाना के इस प्रश्न मैं धर्म के अनुसार जीती गई हूं या नहीं? का कोई उत्तर देना नहीं चाहते !! लेकिन तेलंगाना पर धर्मराज युधिस्ठिर बन यही सन्देश देना चाहते है की अगर तुम रजस्वला और एकवस्त्र होने के बावजूद राजसभा में आओगी तो सभी सभासद मन ही मन दुर्योधन की निन्दा करेंगे। परन्तु चीरहरण तो अटल है,इसको कोई कैसे टाल या विरोध कर सकता है? क्यों नहीं समझते तेलंगाना के मुद्दे पर राजनीति का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है यहाँ!!

Thursday, January 9, 2014

क्षमाप्रार्थी

आप के वयार में हम संभलने लगे
सोहबत में आप के हम निखरने लगे
इस कदर आप से हमको मोहब्बत हुई
टूटके हाथ में बिखरने लगे

आप जो इस तरह से आगे बढ़ जायेंगे 
ऐसे आलम में पागल हम हो जायेंगे
वो मिल गया जिसकी हमें कबसे तलाश थी
बैचैनी इस सांसों में सिर्फ़ नमो नाम की थी
सड़को से संसद में हम अब विचरने लगे
इस कदर आप से हमको मोहब्बत हुई
टूटके हाथ में बिखरने लगे 

सत्ता की ताप से तन पिघल जायेगा
हाथ लग जायेगी मन मचल जायेगा
जलवा दिखा जो दिल्ली के वोट से
चिंगारियां उड़ने लगी प्रजा के शोर से
हम सनम हद से आगे गुजरने लगे
इस कदर आप से हमको मोहब्बत हुई
टूटके हाथ में बिखरने लगे ...:)



[उद्धरण:-हिंदी फ़िल्म-राज़]

Tuesday, December 31, 2013

नव वर्ष का स्पर्श,नव वर्ष का ये हर्ष

आप सभी को नव वर्ष 2014 की हार्दिक शुभकामनाएं..

{नव वर्ष का स्पर्श,नव वर्ष का ये हर्ष }

 
उत्सव मना ये साल भी चला जायेगा
प्रज्ज्वलित छोड़ उम्मीद की मशाल को
कैसी रौशनी थी इसकी फिक्र ही क्यों करे
मशाल अभी है जल रहा फिर जिक्र रौशनी की क्यों करे
रीति निभा प्रीति निभा ये साल चला जायेगा
नव वर्ष का स्पर्श,नव वर्ष का ये हर्ष
कल से हर लम्हा नवीन कहलायेगा
नव वर्ष का नव संघर्ष,उम्मीद की मशाल को
प्रज्ज्वलित रहे सदा इस प्रयास में जुट जाएगा
नव वर्ष का स्पर्श,नव वर्ष का ये हर्ष
कल से हर रीति हर प्रीति नवीन होने पर इतराएगा
पुरातन रिवाज पुरा साल नुतन कहलाएगा
नव वर्ष का स्पर्श,नव वर्ष का ये हर्ष

Thursday, December 26, 2013

देवदासी या देवदूतों की दासी

दिव्य शक्तियों के प्रति आस्था के शब्द देवता या भगवान् की सेवा करने के नाम पर पुजारियों और मठाधिशों की सेवा के लिए शुरू की गई ‘देवदासी प्रथा’ श्याम एवं स्वेत रूप में भले ही समाप्त हो गई जैसी दिखती हो,लेकिन आर्यावर्त्त में शोषित देवदासियां आज भी हैं। हाल ही में मिलाप (एक गैर सरकारी संस्था) द्वारा आयोजित एक सेमिनार में हिस्सा लेने का मौका मिला। आइये थोडा मिलाप के बारे बता दूँ। मिलाप एक ऐसी संस्था है जो गरीब एवं सामाजिक शोषण के शिकार महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य करती है.मिलाप द्वारा आयोजित इस सेमिनार से मैं यह जानकार बहुत विचलित हुआ की देवदासी प्रथा जैसी कुरीति आज भी धर्म और धार्मिक परम्पराओं के नाम पर पूरी तरह से सार्वजनिक तौर पर हमारे समाज में चल रहा है. देवदासी हिन्दू धर्म में ऐसी महिलाओं को कहते हैं, जिनका विवाह किसी पुरुष से नहीं...जी हाँ किसी पुरुष से नहीं वल्कि मन्दिर या अन्य किसी धार्मिक प्रतिष्ठान से कर दिया जाता है। इनका काम मंदिरों की देखभाल,नृत्य तथा संगीत सीखना होता है। परंपरागत रूप से वे ब्रह्मचारी होती हैं, पर अब उन्हे पुरुषों से संभोग के शिकार का धर्माधिकार भी प्राप्त  है। आज जहां महिला अधिकारों को लेकर आंदोलन हो रहे है,महिला अधिकारों को लेकर सरकारें बन रही है,सरकारें गिर भी रही है,नारी शोषण विरोधी ससक्त कानून बने और महिला ससक्तिकरण के लिए अनेक सरकारी योजनाओ के साथ साथ विशेष रूप से महिला बैंक खोले गए बावजूद इसके कर्नाटक,महाराष्ट्र,आंध्र प्रदेश और मध्यप्रदेश के कई इलाके ऐसे हैं,जहाँ देवदासी प्रथा धर्म और धार्मिक परम्पराओं के छत्रछाया में सेवा के नाम पर विलासिता का साधन बन महिला ससक्तिकरण के नाम पर देश की तमाम मीडिया में हो रहे बहस और जनांदोलन बस औपचारिकता एवं दिखावा सिद्ध करता है.

धर्म के इस रंगीन रिवाज़ में DJ भी है,VJ भी है और आपके सहारे के लिए टु(TOOH) भी है जो आपकी मदहोश गुस्ताखियों का पूरा ख़याल रखता है। है कोई समाजशास्त्री या कानूनविद् जो इस अद्भुत विवाह प्रथा को परिभासित कर आज के युग में समानता और समलैंगिक अधिकारो के बराबर क़ानूनी वजन दिला सके ताकि न्याय मानवीय मूल्यो के रक्षा से ज्यादा ऐतिहासिक होने पर इतराये। संस्कृति और असंख्य परम्पराओं के अभिभावक इतिहास को देखे तो राजाओं और सामंतों के लिए इस तरह का रिवाज भोग विलास और समाज मे अपनी प्रतिस्ठा की पहचान था। सदियां गुजरने के बाद भी प्रथा ज्यों की त्यों चली आ रही है, बदले तो सिर्फ हमारे बाहरी आवरण है या यूँ कहे कि फ़िल्म वही है सिर्फ पोस्टर में थोड़ी सी तब्दीली आयी है.

 

है कोई धर्मगुरु जो अपने धर्म सम्मेलनो में धर्म के इस रंगीन रिवाज़ का विरोध कर इसके लिए कार्य करे? कैसे विरोध करेंगे-धर्म के व्यापारी बने ब्रह्मचारियों को इन रिवाजो के जरिये मनोरंजित होने का धार्मिक विशेषाधिकार जो प्राप्त है.हाल ही में समलैंगिक अधिकारो को लेकर न्यायालय से लेकर संसद तक इस मामले को ऐतिहासिक बनाने में व्यस्त दिखा लेकिन इस प्रकार के धर्म  के नाम पर ब्रांडेड शोषण को मानवीय मूल्यो से जोड़ने की न कोई सोचता है और न ही इनके लिए किसी की संवेदना पीड़ा में बदल पाती है... देवदासियों को तो ऐतिहासिक होने का तमग़ा सदियों से है ही.…फिर कोई भी मीडिया इस मुद्दा को क्यूँ अपनाएगा ? इस कुरीति का ना तो नागरिक शास्त्र में जगह है और न ही समाजशास्त्र में,बस एक इतिहास ही है जो आज तक इस कुरीति को इस इस आस में ढो रहा है की कब कोई तारणहार मिले और इस घिनौनी रवायत से शोषित स्त्रियो को आजाद कराये। इनके मानवीय मूल्यो और अधिकारो का ऐतिहासिक होने से ज्यादा सामाजिक होना जरुरी है ताकि ये भी एक आम सामाजिक प्राणी जैसा जीवन व्यतीत सके.मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग से लैस भारतीय प्रजातंत्र में इस तरह के रिवाजो की विद्यमानता इस बात का प्रमाण है की मानवीय अधिकारो की रक्षा के लिए बने ना ना प्रकार के संस्थाएं राजनीती और धर्म के कुचक्र के आगे इतने मजबूर है की मानवाधिकारो का सार्वजनिक एवं ब्रांडेड हनन भी इनको दिखाई नहीं देता ?
सदियों से चली आ रही देवदासी प्रथा धर्म के नाम पर हमारे इतिहास और संस्कृति का एक पुराना और घिनौना अध्याय है और अब इसका क्रिया कर्म होना बहुत ही जरुरी है वर्ना महिला ससक्तिकरण के तमाम सरकारी दावो की विश्वसनीयता सदैव प्रश्न चिन्ह के घेरे में दिखेगी?

Thursday, December 12, 2013

परिवर्तन की आशा बना तमाशा

दिल्ली में परिवर्तन की राजनीति की  ऐसी दुर्दशा होगी किसको पता था... संबिधान भी मजबूर...और विधि का विधान भी...किसको पता था की परिवर्तन की आशा एक तमाशा के रूप में उभरेगा? लोकशाही का ये तमाशा हमें ये सोचने पर मजबूर का रहा है कि विकास का मुद्दा का विकास अब रुक गया है.… या यूँ कहे कि भारतीय राजनीती में विकास एक सोफिस्टिकेटेड मुद्दा हो चला है जिसमे भारतीय जनसँख्या का वही १५-२०% अपमार्केट लोग है जो इस मुद्दे से अपने आप को जोड़ पाते है या कही ऐसा तो नहीं कि भारतीय राजनीती में सत्ता को फैंटसी मानने वाले लोग देश की तमाम मीडिया का दुरूपयोग कर विकास को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत कर महंगाई के सामने विकास को ही भारत के विकास के आगे दोषी मान देश को गुमराह कर रहे है क्योंकि सत्ता का मुख्य ईंधन अर्थशास्त्र यह कहता है कि महंगाई विकास का साइड इफ़ेक्ट है और विकास होगी तो महँगाई बढ़ेगी ही. मोटे मोटे तौर पर ये कहे कि पेट्रोलियम उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारो से जोड़ना और सब्सिडी को समाप्त कर आधार योजना के जरिये DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर) सरीखे योजनाओ से उपभोग की विशुद्धता बढ़ाने का प्रयास विकास के इसी साइड इफेक्ट्स का सुधारक उपाय ही तो है तो गलत नहीं होगा।

बचपन में हमारे बुजुर्गों से जब विदेश जाने से सम्बंधित कोई वार्तालाप होती थी तो यही कहते थे अगर आप विदेश जाने को सोच रहे है तो बम्बई में कुछ दिन जाकर रह लीजिये,विदेश में एडजस्ट होने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। यह कुछ और नहीं बम्बई के विकसित होने का प्रमाण था.लेकिन आज के हालत में यहाँ कि स्थिति ऐसी है जैसी पाव(पाव बोले तो पावरोटी) के बीच में चटनी के साथ वडा का होता है… ऊपर से प्रतिष्ठा और विरासत और निचे से तेज रफ़्तार जिंदगी का लाइसेंस और बीच में बड़ा जो बड़ी इज्जत से बेसन के लेप के साथ फ्राई होकर भूख की मजबूरी को इज्जत प्रदान कर रहा होता और अब तो प्रतियोगिता ऐसी की यह जंबो के नाम से भी जाना जाने लगा है... हो भी क्यों न सब चीज विकास के दौड़ में है तो फिर मज़बूरी भी पीछे क्यों रहे... मज़बूरी भी अब जंबो हो गया लेकिन विदेश वाली धारणा या अग्रेजी में स्टेटस बोल लीजिये चाहे फीलिंग यह जंबो नहीं बन पाया।

पर आज हमारे अनुज विदेश जाने से सम्बंधित मुद्दे पर सलाह मांगे तो उन्हें यही बोलूंगा अगर आप विदेश जाने को सोच रहे है तो दिल्ली में कुछ दिन जाकर रह लीजिये,विदेश में एडजस्ट होने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। आज की तारीख में दिल्ली में वो तमाम संसाधन है जो विदेशो में होता है.रही बात महंगाई की भारत के प्राचीन विदेश के मुक़ाबले भारत के नए विदेश मे सब कुछ सस्ता है.…बिजली का बिल,पेट्रोल से लेकर डीजल तक.…रही बात भ्रष्टाचार की यह मुद्दा भी है और मानसिकता भी और इसके लिए सिर्फ सियासी संस्थाओं को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता...मौका मिलने पर हम सभी इस पर NOTA का विरोध करेंगे। दिल्ली में जो विकास हुआ है वो भारत के किसी भी शहर के मुक़ाबले अद्वितीय है और इसका नायक कोई और नहीं श्रीमती शीला दीक्षित है.…विकास का जज्बा किसी सियासी संस्था या चुनावी मैनिफेस्टो (जिसका महत्व चुनाव में संबिधान से कम नहीं होता है) में नहीं होता। यह तो किसी व्यक्ति विशेष का जूनून होता जिसकी प्रजाति हमारे हिंदुस्तान की सत्तातंत्र में दुर्लभ ही है।

चमत्कार होगा जरूर यह परिवर्तन रूपी एक टोटका है जो ज्यादातर सत्य नहीं होगा यह तो कन्फर्म है परन्तु सत्य ही होगा ये निश्चित तौर पर IRCTC के प्रतीक्षा सूची जैसा है जिसमे ये खतरा सदैब बना रहता है कि कही यात्रा के ऐन वक़्त पर विदाऊट टिकट न हो जाऊ. चुनाव के बाद भी सरकार न बन सके यह संवैधानिक संकट अपरिपक्व लोकतंत्र के संकेत है जिसमें बहुमत में बदलाव की भावना अभी भी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुई है.पांच साल में एक बार से ज्यादा चुनाव होना देश के अर्थ तंत्र पर एक थोपी हुई मजबुरी है जो किसी भी दृष्टिकोण से न राष्ट्र के हित में है और न ही जनता जनार्दन के हित में. गुस्सा के आगोश में निर्णय सदैब घातक होता है और दिल्ली भी इसी खुन्नस में आज न हार से दुखी है और न जीत से सुखी? वर्त्तमान भुतकाल हो जाने से या भुतकाल वर्त्तमान हो जाने से सब कुछ अचानक से ठीक हो जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है...जो दीखता है वो थोड़ा ज्यादा बिकता है पर टिकता कितना है वह भी सोचना जरुरी है…अगर आप इसको बायस्ड सोच मानते है तो NOTA वाला लोटा भी देखिये पानी से लबालब मिलेगा..

लोकतंत्र में क्रांति प्रतिशोधात्मक नहीं होनी चाहिए…क्रांति हो तो ऐसी हो जो अवगुण के विरोध के साथ सदगुण का सम्मान भी करे…वर्ना कही ऐसा न हो कि शकुनि के प्रतिशोध के महाभारत युद्ध की तरह सबकुछ समाप्त हो जाए और अवशेष के रूप में बचे तो महाभारत की किताब जिसमे धर्म और अधर्म आज भी यही उधेड़बुन में हो कि आखर इस महाभारत में विजयी कौन हुआ ?