एक संत,रंगभेद विरोध के प्रणेता नेल्सन मंडेला अब हमारे बीच नहीं रहे.…नेल्सन मंडेला .…एक ऐसी शख्सियत, जिसने दुनियाभर में रंगभेद के विरोध में आवाज को बुलंद किया. हालांकि मंडेला एक सम्मानित कबीले थेंबू से आते थे, पर उन्होंने बचपन से ही देखा था कि कैसे अश्वेतों के साथ अन्याय किया जाता है. भारतीय होने के नाते मुझे यह बहुत विचित्र लगता है कि उन्होंने रोल मॉडल के रूप में महात्मा गांधी जी को नहीं, नेहरु जी को स्वीकार किया। उन्होंने यह भी साफ़ तौर पर कहा था कि अहिंसा को उन्होंने नीति के रूप में स्वीकार किया,सिद्धांत के रूप में नहीं। वैसे हम भारतीय भी भेद को हलके तरीक़े से नहीं देखते ,हमारे यहाँ तो यह विकाशशील होने के ठप्पे के साथ विकास कि राजनीती का आँवला है जिसके फ़ायदे हजार है और रख रखाव पे खर्च न के बराबर। देखिये न कैसा विचित्र संयोग है दुनिया के भेद से लड़ने वाला एक महान नेता का आज निधन और 21 साल पहले आज ही के दिन अयोध्या में एक और ऐतिहासिक भेद का भूमिपूजन किया गया था.भेद क्या है? मेरी नजर में यह एक असुरक्षित मानसिकता है जो हर समय अपना वर्चस्व कायम रखने के फ़िराक़ में लगा रहता है और यही मानसिकता आकर्षित करती है उन सियासी लोगो को जो जनमत के ध्रुवीकरण तलाश रहे होते है और फिर इसी से शुरू हो जाती है उत्थान और पतन का विपणन। जातिवाद का भेद,प्रांतवाद का भेद,भाषा कि राजनीती,भीतरी रेखा परमिट से लेकर अभी के समय की बहुचर्चित धारा 370। सियासी लोगों केलिए ये इतना मायने रखता है कि इन सब से हम तमाम भारतीयों को रु ब रु कराने,समझाने के लिए प्रज्ज्वलित टैगलाइन के साथ रैलियों में करोडो फुक देते है और हम बिना कुछ सोच विचार किये उसी चोले में सज बलबूता नहीं तो लात जूता का सूत्र अपना मानवता के शोषण में जी जान से जुट जाते है.जिसे सियासी लोग मुद्दे कहते है असल में वो सामाजिक समस्याएं है और मुद्दों पर तो सियासत हो जाती है परन्तु समस्यायों पर सियासत हो नहीं सकती तो फिर अपनाने कि बारी हो या गोद लेने कि बारी हो समस्यायों को कौन पूछने वाला है,मुद्दे ही अपनी आइटम अच्छी होयेंगी न भाई ! इतिहास साक्षी है,जब मुद्दा एक था तो क्रांतिकारियों कि कतार लगी थी और दुर्भाग्य आज विकास के नाम पर मुद्दो कि तादाद बढ़ी है तो क्रातिकारियों कि आकाल पड़ी है और हो भी क्यों न मुद्दे भी तो किसी न किसी तरह के भेद से संक्रमित हो गए है और इस संक्रमण में पड़ना भी नहीं चाहिए…हमें इसका पक्षधर होने में कोई संकोच नहीं होता। मुद्दो का एकीकरण महत्वपूर्ण है और जब तक मुद्दे वहुवचन से एकवचन नहीं हो जाते जन क्रांति का अलख नहीं जगेगा और ना ही महात्मा गांधी मिलेंगे…ना ही नेल्सन मंडेला…मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है... हम सब भूलने लगे है इस बात को... ऐसा प्रतीत होता है?
Negative Attitude
Negative Attitude
Friday, December 6, 2013
Wednesday, November 27, 2013
तहलका
मामला तहलका के तेजपाल का हो या तेजपाल के तहलका का, तहलका तो होना ही था.सत्ता के प्रभावरूपी चादर से सुचना नियंत्रण या इसको छिपाना कोई नयी बात नहीं है और घोडा जैसे घास से दोस्ती नहीं कर सकता तो सत्ता तहलका यानि सुचना बम से कैसे दोस्ती कर सकता है? कहते है एक स्त्री के लिए महाभारत जैसा विशाल युद्ध हुआ था जिसमे धर्म को भी अपनी वजूद और महत्ता सिद्ध करने के लिए कई बार शोषित और शर्मशार होना पड़ा था. सत्ता और इससे जुड़े प्रपंच में विजयी भवः होने के लिए सदियों से स्त्रियों की सम्मोहन शक्ति का उपयोग बिना तपस्या वाली ब्रह्मास्त्र के रूप में किया जाता रहा है और फिर गोआ तो विश्व की प्रमुख पर्यटन स्थल में शुमार है जहाँ न तो इंद्र कि कमी है और न ही उसकी अपसराओं क़ी.THINK FEST जैसी वैचारिक मंथन के नाम पर सत्ता का मतलब और सत्ता के मायने का विपणन हेतु गोआ जैसे पर्यटन स्थल से माक़ूल स्थान हो ही नहीं सकता है और जिस तरह से पूरा प्रकरण मीडिया और राजनितिक गलियारो में हर दिन एक नयी ऊर्जा प्राप्त कर रहा है मानो कोई एक दुर्लभ ज्योतिषीय विशिष्टता वाली घटना घटित हुई हो.नर शोषण हो या नारी शोषण, निश्चित तौर पर यह घृणित अपराध है किन्तु जिस प्रकार से इस शोषण को दर्शाया जा रहा है वो कही न कही वैचारिक खोखलेपन का भी संकेत देता है जिसमे कही कोई अदृश्य शक्ति इस नारी शक्ति का इस्तेमाल कर फिर से उस काल्पनिक दौर में ले जा रहा है जहाँ स्त्रियों को भगवान् तो मानते भी थे लेकिन जरूरत पड़ने पर स्त्रीत्व कि अग्नि परीक्षा भी लेते थे. नारी शोषण पर सजग होना हमारे समाज के लिए अत्यंत सकारात्मक सन्देश है लेकिन इसका वर्गीकरण इसी नारी को न्याय के तराजू में दो बटखरे से तौले जाने पर मजबूर करता है. आज के दौर क़ी शिक्षित और कामकाजी स्त्रियाँ इतनी भोली भी नहीं हो सकती क़ी अपने मौलिक अधिकारो और इससे जुड़े क़ानूनी प्रक्रियायों से अनभिज्ञ हो और जिस तरह से किस्तो में इससे सम्बधित घटनाएं मीडिया के जरिये सामने आ रही है वो इन्ही जिम्मेदारियों,भावनाओ को बार बार चोट पहुँचा रही है कि कब तक इस देश कि राजनीती सत्ता,माफिया और सम्मोहन के इस खेल से इंसानियत को मोहरे कि तरह इस्तेमाल कर इंसानियत को ही कटघरे में खड़ा कर लुंगी डांस पर उत्सव मनाता रहेगा। प्रजातंत्र में विपक्ष को मारना मतलब तानाशाह को समर्थन करना है और मीडिया तो प्रजातंत्र में वो व्यवस्था है जो न सिर्फ सिक्के उछालती है वल्कि प्रतियोगी और प्रतियोगिता का तृतीय अंपायर का रोल भी अदा करती है.अपराधी तरुण तेजपाल है ये सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज़,FIR और पुलिस के चहलकदमी से सिद्ध नहीं होता.... SU-DOKU का खेल तो पूरा होने दो.... मतलब भी समझ आ जाएगा और मायने भी,तहलका में जो तहलका हुआ है जनाब …
Wednesday, November 13, 2013
ओपिनियन पोल
ओपिनियन पोल है बकवास लेकिन,कोई है ख़ास तो कोई है निराश..
मज़मा यूँ ही नहीं लगता जम्हूरियत में,गुल्लक इकठ्ठा यूँ ही नहीं होता...
तिज़ारत करने वाले जानते है कि बकवास की भी कीमत होती है..
बस समझना ये है कि बेचने वाला या ग्राहक- है कौन ख़ास...
ओपिनियन का बाज़ार,विरोधी है हज़ार,बकवास बिकेगा ऊँची कीमत मे...
देखना क्योंकि जम्हूरियत में नहीं व्यर्थ जाती है आस...
ओपिनियन की जमाखोरी है अभी,बस समय का इन्तेजार है..
है (मज़मा+ओपिनियन पोल)२ का समीकरण और चुनाव है बिलकुल पास...
हल ढूढ़ने में लगा रहे है सभी कयास,यह समीकरण है जो इतना ख़ास..
वाह वाह सुनने के लिए बकवास कहना पड़ता है वर्ना राजनीती में क्या होता है बकवास...
यहाँ होतें सभी ख़ास,न होते है कोई निराश और होते हम आस पास..
इस समीकरण का हल जरुरी है बस यही मज़बूरी है...
जनता को पटाना है,मज़मा भी लगाना है..
कब मौसम बदल जाए, होता नहीं इसका आभास...
कब कहा ओपिनियन पोल है बकवास,बस लोगो को ग़ुमराह करने का है ये प्रयास..
मज़मा यूँ ही नहीं लगता जम्हूरियत में,गुल्लक इकठ्ठा यूँ ही नहीं होता...
तिज़ारत करने वाले जानते है कि बकवास की भी कीमत होती है..
बस समझना ये है कि बेचने वाला या ग्राहक- है कौन ख़ास...
ओपिनियन का बाज़ार,विरोधी है हज़ार,बकवास बिकेगा ऊँची कीमत मे...
देखना क्योंकि जम्हूरियत में नहीं व्यर्थ जाती है आस...
ओपिनियन की जमाखोरी है अभी,बस समय का इन्तेजार है..
है (मज़मा+ओपिनियन पोल)२ का समीकरण और चुनाव है बिलकुल पास...
हल ढूढ़ने में लगा रहे है सभी कयास,यह समीकरण है जो इतना ख़ास..
वाह वाह सुनने के लिए बकवास कहना पड़ता है वर्ना राजनीती में क्या होता है बकवास...
यहाँ होतें सभी ख़ास,न होते है कोई निराश और होते हम आस पास..
इस समीकरण का हल जरुरी है बस यही मज़बूरी है...
जनता को पटाना है,मज़मा भी लगाना है..
कब मौसम बदल जाए, होता नहीं इसका आभास...
कब कहा ओपिनियन पोल है बकवास,बस लोगो को ग़ुमराह करने का है ये प्रयास..
Monday, November 4, 2013
शर्त लगा बैठा संघर्ष से,हर्ष का क्या
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नम तो कभी है तारा रमपम
ऐ जिंदगी तेरे हर कदम में दीखता कुछ और है
हर बात का अपना इक मिज़ाज़ है और उसी का दमखम है
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नाम तो कभी है तारा रमपम
तेरे मौसम,तेरे रिश्ते,तेरी रवायतें वाह क्या हिज़रत है
उत्सव आने का हर्ष और उत्सव मनाने का संघर्ष
उत्सव के इस मौसम में लगी वही उत्सव की ही शर्त है
तारीखों का ये हिज़रत कल किसी और प्रदेश में
बेताब है उत्सव के इसी शर्त को निभाने में
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नम तो कभी है तारा रमपम
ऐ जिंदगी तेरे हर कदम में दीखता कुछ और है
हर बात का अपना इक मिज़ाज़ है और उसी का दमखम है
पीढ़ियां भी तो हिज़रत ही है जो रवायतों में है दिखती
और इन्ही रवायतों में दीखता है वो गुमां,वो तल्खी
कही इसकी शर्त है,कही इसका हर्ष है और कही संघर्ष
आज हिज़रत पर बंदिशे है बहोत,रवायतें तो कम होंगी ही
शर्त लगा बैठा संघर्ष से,हर्ष का क्या
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नम तो कभी है तारा रमपम
ऐ जिंदगी तेरे हर कदम में दीखता कुछ और है
हर बात का अपना इक मिज़ाज़ है और उसी का दमखम है..
ऐ जिंदगी तेरे हर कदम में दीखता कुछ और है
हर बात का अपना इक मिज़ाज़ है और उसी का दमखम है
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नाम तो कभी है तारा रमपम
तेरे मौसम,तेरे रिश्ते,तेरी रवायतें वाह क्या हिज़रत है
उत्सव आने का हर्ष और उत्सव मनाने का संघर्ष
उत्सव के इस मौसम में लगी वही उत्सव की ही शर्त है
तारीखों का ये हिज़रत कल किसी और प्रदेश में
बेताब है उत्सव के इसी शर्त को निभाने में
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नम तो कभी है तारा रमपम
ऐ जिंदगी तेरे हर कदम में दीखता कुछ और है
हर बात का अपना इक मिज़ाज़ है और उसी का दमखम है
पीढ़ियां भी तो हिज़रत ही है जो रवायतों में है दिखती
और इन्ही रवायतों में दीखता है वो गुमां,वो तल्खी
कही इसकी शर्त है,कही इसका हर्ष है और कही संघर्ष
आज हिज़रत पर बंदिशे है बहोत,रवायतें तो कम होंगी ही
शर्त लगा बैठा संघर्ष से,हर्ष का क्या
कभी ख़ुशी,कभी गम,कभी आँखें है नम तो कभी है तारा रमपम
ऐ जिंदगी तेरे हर कदम में दीखता कुछ और है
हर बात का अपना इक मिज़ाज़ है और उसी का दमखम है..
Saturday, November 2, 2013
Friday, October 18, 2013
दि ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2013 और भारत निर्माण?
दि ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2013 के अनुसार विश्व में अभी तकरीबन 3 करोड़ लोग गुलाम का जीवन जी रहे हैं, इनमें से तकरीबन आधे केवल भारत में हैं.आज़ाद भारतीय गणराज्य में गुलामी/दासता की इतनी बड़ी तादाद इस बात के संकेत है की अंग्रेजो से आजादी हासिल करनी शायद आसान थी परन्तु आज़ादी से आज़ाद होना बहुत कठिन है। या यूँ कहे की स्वतंत्रता अभी भी कही न कही गुलामी के माहौल में ही है और एक ऐसी समाज, एक ऐसी संबिधान,एक ऐसा तंत्र की तलाश कर रहा है जो मानवीय स्वरुप के बटवारे से मुक्त हो,जहाँ सामाजिक सुरक्षा की औषधि आरक्षण न हो,जहाँ कानून के नियमो के आवाज़ और न्याय एक हो,जहाँ जिंदगी और जिंदगी की गुणवता की परिभाषा की भाषा एक हो,जहाँ धर्म और इसके प्रति निरपेक्ष होने के लिए धर्म को अपराधी न बनाया जाए। सिर्फ लकीरे खींचने से मानवीय मतभेद समाप्त हो जाते तो अब तक दुनिया भर के शब्दकोष में आजादी और गुलामी के अर्थ बदल जाने चाहिए थे। एक हिन्दुस्तान के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी और आज इसी आज़ाद हिन्दुस्तान के भीतर 28 से ज्यादा सरहदें है। कहीं सवर्ण,कहीं दलित,कहीं महादलित,कहीं अल्संख्यक,कही भाषा,कहीं प्रांतवाद तो कही भीतरी रेखा परमिट। लकीरे खींचते खींचते इंसान यहाँ इतने टुकडो में बँट गया की गुलामो और शोषितों की संख्या में आज हम विश्व में अव्वल नंबर पर है। गुलाम थे तो एक हिस्सेदार था और अब आज़ाद है तो सब हिस्सेदार हो गए। हिस्सेदारों की बढती तादाद,राजयोग का मोह और गहरी लकीरों में बँटी जनता आज़ाद भारत की राजीनीति में इस तरह काबिज है की संबिधान में हर रोज कई पुराने पन्ने निकाल कर भारत निर्माण के नाम पर कई नए पन्ने जोड़ दिए जाते है ताकि बंटवारे और लकीरों की राजनीती हर दिन नए और कामुक रूप में प्रस्तुत कर क़ानूनी तौर पर जब चाहे तब भुना लिया जाय। भारत निर्माण सिर्फ संसद में प्रस्तावित बिलों का विज्ञापन कर नहीं किया जा सकता,इसके लिए लकीरों पर अंकुश लगाना होगा,इसके लिए मानवीय स्वरूपों के विभाजन और फिर विपणन रोकना होगा। भारत निर्माण तब सफल होगा जब स्वतंत्रता पूरी तरह स्वतंत्र होगी,आजादी शोषित नहीं होगी और राजनीती नस्लबाद और फिर नक्सल्बाद न करे। *भारत में गुलामो की अनुमानित संख्या :- 13,300,000 –14,700,000 है * 32.7% भारतीय अपना जीवन अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा US$1.25/प्रति दिन के नीचे जीने को मजबूर है -मिलो हम आ गए,मिलो हमें जाना है ??
Thursday, October 10, 2013
आप सबो को दुर्गापूजा की ढेर सारी शुभकामनाएं…
"सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके.शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते"
दोस्तों आज महाषष्ठी है यानी शारदीय नवरात्र का छठा दिन। महाषष्ठी के दिन प्रतिमा को पंडाल में लाकर रखा जाता है और शाम को 'बोधन' के साथ माँ दुर्गा के मुख से आवरण हटाया जाता है और इसके साथ ही आज शाम 'लुचि-तरकारी' यानि पूरी सब्ज़ी खाने के इस रस्म के साथ दुर्गोत्सव का जश्न शुरू ...दुर्गा पूजा के ये चार दिन क्या कहने । हर जगह खुशी और उल्लास। लोगों का हर रोज़ सुबह उपवास रख माँ दुर्गा के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करने दुर्गा पंडाल जाने के लिए घर में भागमभाग और पुष्पांजलि का कभी भी निर्धारित समय पर न हो पाना आदि इस दुर्गोत्सव के जश्न का हिस्सा होता है। लोगों की भीड़ और धूप बाती की आध्यात्मिक गंध के साथ ढाक (ढोल) की आवाज़,धूनुचि नाच और शंख वादन पूरे वातावरण को पवित्र कर रही होती है। तो अब देर किस बात की....दोपहर अब बस संध्या में तब्दील होने ही वाला है…आगाज़ हो इस महाजश्न का…आगाज़ हो दुर्गोत्सव का…आगाज़ हो इस महोत्सव का…आप सबो को दुर्गापूजा की ढेर सारी शुभकामनाएं…:)
दोस्तों आज महाषष्ठी है यानी शारदीय नवरात्र का छठा दिन। महाषष्ठी के दिन प्रतिमा को पंडाल में लाकर रखा जाता है और शाम को 'बोधन' के साथ माँ दुर्गा के मुख से आवरण हटाया जाता है और इसके साथ ही आज शाम 'लुचि-तरकारी' यानि पूरी सब्ज़ी खाने के इस रस्म के साथ दुर्गोत्सव का जश्न शुरू ...दुर्गा पूजा के ये चार दिन क्या कहने । हर जगह खुशी और उल्लास। लोगों का हर रोज़ सुबह उपवास रख माँ दुर्गा के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करने दुर्गा पंडाल जाने के लिए घर में भागमभाग और पुष्पांजलि का कभी भी निर्धारित समय पर न हो पाना आदि इस दुर्गोत्सव के जश्न का हिस्सा होता है। लोगों की भीड़ और धूप बाती की आध्यात्मिक गंध के साथ ढाक (ढोल) की आवाज़,धूनुचि नाच और शंख वादन पूरे वातावरण को पवित्र कर रही होती है। तो अब देर किस बात की....दोपहर अब बस संध्या में तब्दील होने ही वाला है…आगाज़ हो इस महाजश्न का…आगाज़ हो दुर्गोत्सव का…आगाज़ हो इस महोत्सव का…आप सबो को दुर्गापूजा की ढेर सारी शुभकामनाएं…:)
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