मैं ये लेख लिखना नहीं चाहता था पर अपने आप को रोक नहीं पाया।
भारत में आम आदमी के अभिव्यक्ति की आजादी कितनी सुरक्षित है इसका एक
उदाहरण (मुंबई की फेसबुक वाली घटना) हम सब भूले तो नहीं ही होंगे.दिवंगत
श्री बाला साहब ठाकरे के निधन पर एक फेसबुक यूजर ने फेसबुक स्टेटस लिखा और
उसकी दोस्त ने उसे शेयर कर दिया और एक राजनितिक पार्टी के कार्यकर्ताओं की
शिकायत पर दो युवतियों को अपनी निर्दोष भावना व्यक्त करने पर पुलिस ने
अतिशय तेजी दिखाते हुए रात मे ही गिरफ्तार कर लिया था।
हाल ही में
बसपा के सांसद शफीकर्रहमान बर्क ने देश की संसद में....जी हाँ संसद
में..इन्टरनेट पर नहीं...वन्देमातरम का बहिष्कार करके साबित किया है कि ये
लोग वोट बैंक के लालच में तुष्टिकरण के लिये किसी भी हद तक जा सकते है।
वन्देमातरम जो माँ की आराधना का गान है आजादी की लड़ाई का मूल मंत्र रहा है
उसका खुला विरोध करके क्या सांसद महोदय ने लोकतंत्र का अपमान नही किया है?
राजनेताओं
के ऊपर की गई आम आदमी(जो मतदाता भी है) की टिप्पणी पर तो पुलिस बहुत तेजी
से गिरफ्तारी की कार्यवाही करती है लेकिन जब कोई नेता या रसूखदार व्यक्ति
सरेआम अभद्रता करते हैं तो उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही होती। संसद जो
लोकतंत्र की मंदिर मानी जाती है,में एक सांसद द्वारा ही समस्त सांसदों की
उपस्थिति में देश की भावनाओं का बलात्कार किया जाता है और इस बलात्कार पर
कोई भी राजनितिक पार्टी गंभीर नहीं दिखाई देती... बसपा सुप्रीमो मायावती
ने तो इस मामले पर मौनव्रत ही धारण कर लिया है। देश की मीडिया ने भी इस
विषय पर कोई ख़ास तवज्जो नहीं दिया। कुछ बहस हुई और बात ख़त्म...अब इस
इंधन,इस
उर्जा की क्या आवश्यकता? आजादी मिलने तक ही इसकी उपयोगिता थी।
क्या ये
यह संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार का सरेआम उल्लंघन नहीं है? यह सही है
कि अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की भी अपनी सीमायें और मर्यादा है। लेकिन
इसकी कर्त्तव्यपरायणता में तो कोई आरक्षण नहीं होनी चाहिये... कोई धर्मभेद
नहीं होनी चाहिए...क्या वन्देमातरम के बहिष्कार से देश की भावनाओं को
क्षति नहीं पहुंचा है? क्या IT ACT और इस कानून के तर्क इन सांसदों पे लागु
नहीं होता है?
{...वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्, [यानि साफ स्वव्छ जल ,अच्छे मीठे फल और शीतल हवाएं देने देने वाली ]
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् .. [ चारो ओर हरियाली है]
शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,[ जिसकी चांदनी धवल फैली / में रात मतवाली है ]
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,[जहाँ डाल डाल फूल खिले / कमलों की लाली है ]
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,[जिसका हृदय है हास्य पूर्ण / मीठी जिसकी बोली है]
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ...
इन पंक्तियों में है देश की खुशहाली
कई होली और है कई दिवाली
है ईद की खुशियाँ और शब्-ए-बरात की कव्वाली
धर्मो का भण्डार है ये और है राष्ट्रधर्म की बोली
इन पंक्तियों में देश है बसता
शहीदों की है ये रंगोली कहाँ करती अट्हास है किसको
और किसको करती है ये ठिठोली
इन पंक्तियों में है देश की खुशहाली
कई होली और है कई दिवाली...}
भारतीय
लोकतंत्र की एक बदकिस्मती है की लोकतंत्र का चोला पहन इसके ही नुमाइन्दे
वोट बैंक की खातिर इसकी अस्मत लुटने को आतुर है। भ्रस्टाचार,चीन या
पकिस्तान के मुद्दे पे बोलने की बात आती है तो ये पूरी इमानदारी से
प्रतिक्रिया देने में जुट जाते है लेकिन अफ़सोस इस मुद्दे पे देश के दीवानों
की आकाल पड़ी है???
आश्चर्य है… भारत में आम आदमी के अभिव्यक्ति की
आजादी कानून के दायरे में होनी चाहिए और राजनेताओं की अभिव्यक्ति की आजादी
पर कानून लागु ही नहीं होता है???
Negative Attitude
Negative Attitude
Tuesday, May 14, 2013
Saturday, May 11, 2013
संसद- Sine Die
भ्रष्टाचार
एक ऐसा मुद्दा है जिसके खिलाफ प्रतिक्रिया तो सभी देना चाहते है लेकिन
मौका मिले तो इसका सम्पूर्ण आनंद उठाने में लोगो को तानिक भी देर नहीं
लगती। ये एक ऐसी सच्चाई है जिसका हर व्यक्ति अनुसरण करना चाहता है,विरोध
तो सिर्फ आगे बढ़ने के लिए एफ्रोडीजिआक के तौर पर किया जाता है.इसका उपयोग
राजनीती के पॉवर प्ले का पूरा पूरा लाभ उठाने के मकसद हेतु होता है। संसद
बिना कोई ठोश काम काज के भ्रष्टाचार के मार से एक बार फिर अनिश्चितकालिन
(SINE DIE) पस्त हो गया.विपक्षी पार्टिया अब ये पीठ थपथपा रही है की उनकी
इस्तीफे की मांग जायज़ थी,अगर सरकार उनकी मांग मान लेती तो संसद का कार्य
नहीं रुकता। बात भ्रष्टाचार या मंत्रियों की इस्तीफे की नहीं है बात तो ये
है की इस धमा चौकड़ी का असली मकसद तो यही था की संसद चलने न पाए ताकि
सत्ताधारी दल अपनी उपलब्धियों की सूचि में कुछ और पंक्तियाँ जोड़ने में
असफल हो। खाद्य सुरक्षा बिल ,भूमि अधिग्रहण बिल जैसे कई अति महत्वपूर्ण
बिल पर कोई कार्य नहीं हो सका और आश्चर्य इस बात की है की इसका मलाल लगभग
पूरी राजनितिक जमात को नहीं है। ये एक गैर जिम्मेदार लोकतंत्र के संकेत है
जहाँ जनता को लेकर पूरा लोकतंत्र ,पूरी राजनितिक जमात इस तरह निश्चिंत है
मानो आम जनता के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी बनती ही नहीं है।
अगर आप संसदीय ढांचे और उसके कार्य करने के तरीके को देखे की तो आपको हमारा संसद लगभग 802 (250 राज्य सभा + 552 लोक सभा) सदस्यों वाली एक पार्टनरशिप वाली कंपनी की तरह कार्य करती मालूम पड़ेगी जिसमे कंपनी की शटर की चाभी कुछ गिने चुने व्यक्तियों के पास ही है जो अपने दलगत नफ़ा नुकसान के हिसाब से जब चाहे शटर डाउन कर सकते है। अगर निर्णय इन्ही गिने चुने व्यक्तियों को लेना देना है फिर सांसदों के इतने भारी भरकम हुजूम किस काम का?
विश्व के एक-तिहाई गरीब भारत में हैं, जो रोजाना 1.25 डालर (करीब 65 रुपये) से कम में जीवन-यापन करते हैं। ये क्या इस बात के साक्ष्य नहीं है की हमारी विशालकाय संसदीय लोकतंत्र आम जनता के प्रति कितनी बेफिक्र है की खाद्य सुरक्षा बिल जैसे अति गंभीर मुद्दे पे बिना कोई चर्चा के संसद का शटर डाउन कर दिया गया। आज अगर शोर है तो सिर्फ और सिर्फ दो मंत्रियों की इस्तीफे की,कब तक विपक्ष+मीडिया के चक्रव्यूह में आम लोगो की समस्याए जमींदोज होती रहेंगी। विपक्ष के लिए तो बस सत्ता के खक्खन के आगे समस्यों को हल करने की गति धीमी रहनी चाहिए ताकि आम जनता के अन्य समस्याओं के लिए राजनीतिज्ञों को ज्यादा जिम्मेदार न माना जा सके और उनके लिए मुद्दे रेडीमेड रूप में दोषारोपण के लिए सदैब उपलब्ध रह सके। सैकड़ों वर्षों तक हम आपसी लड़ाइयों में उलझे रहे। विदेशियों के आक्रमण पर आक्रमण होते रहे। सेनाएं हारती-जीतती रहीं। शासक बदलते रहे। वजह सिर्फ एक ही था आपसी फुट,आपसी कलह। आज भी हम इसी राह पर चल रहे है पहले आपसी लड़ाइ में किताब का कोई सहारा न था और आज जब इसका सहारा मिला है तो हम इसका उपयोग मात्र सत्ता के लिए कर रहे है पहले इस लड़ाई का उपयोग परदेशी उठाते है और आज घर के ही लोग उठा रहे है, इस अफरा-तफरी,इस बेचैनी,इस उहा पोह से गैर जिम्मेदार वातावरण का निर्माण हो रहा है जो व्यवस्था के हर हिस्से को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है चाहे वो मीडिया हो,व्यापारी वर्ग हो या प्रशासन...सब बीमार हो रहे है!!!
भारतीय लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। इसी माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। ‘संसदीय’ शब्द का अर्थ ही ऐसी लोकतंत्रात्मक राजनीतिक व्यवस्था है जहां सर्वोच्च शक्ति लोगों के प्रतिनिधियों के उस निकाय में निहित है जिसे ‘संसद’ कहते हैं। यह वह धुरी है,जो देश के शासन की नींव है। जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था होने के नाते इसकी कार्य प्रणाली जिम्मेदार होनी चाहिए जिससे देशहित और आम जनता के उत्थान के लिए कार्य हो सके, ऐसा बिलकुल न हो की दलगत राजनीती और सत्ता प्रेम के लिए जब चाहे संसद का शटर डाउन कर दे। संसद को पार्टनरशिप कंपनी न बनने दे...वन्दे मातरम...
अगर आप संसदीय ढांचे और उसके कार्य करने के तरीके को देखे की तो आपको हमारा संसद लगभग 802 (250 राज्य सभा + 552 लोक सभा) सदस्यों वाली एक पार्टनरशिप वाली कंपनी की तरह कार्य करती मालूम पड़ेगी जिसमे कंपनी की शटर की चाभी कुछ गिने चुने व्यक्तियों के पास ही है जो अपने दलगत नफ़ा नुकसान के हिसाब से जब चाहे शटर डाउन कर सकते है। अगर निर्णय इन्ही गिने चुने व्यक्तियों को लेना देना है फिर सांसदों के इतने भारी भरकम हुजूम किस काम का?
विश्व के एक-तिहाई गरीब भारत में हैं, जो रोजाना 1.25 डालर (करीब 65 रुपये) से कम में जीवन-यापन करते हैं। ये क्या इस बात के साक्ष्य नहीं है की हमारी विशालकाय संसदीय लोकतंत्र आम जनता के प्रति कितनी बेफिक्र है की खाद्य सुरक्षा बिल जैसे अति गंभीर मुद्दे पे बिना कोई चर्चा के संसद का शटर डाउन कर दिया गया। आज अगर शोर है तो सिर्फ और सिर्फ दो मंत्रियों की इस्तीफे की,कब तक विपक्ष+मीडिया के चक्रव्यूह में आम लोगो की समस्याए जमींदोज होती रहेंगी। विपक्ष के लिए तो बस सत्ता के खक्खन के आगे समस्यों को हल करने की गति धीमी रहनी चाहिए ताकि आम जनता के अन्य समस्याओं के लिए राजनीतिज्ञों को ज्यादा जिम्मेदार न माना जा सके और उनके लिए मुद्दे रेडीमेड रूप में दोषारोपण के लिए सदैब उपलब्ध रह सके। सैकड़ों वर्षों तक हम आपसी लड़ाइयों में उलझे रहे। विदेशियों के आक्रमण पर आक्रमण होते रहे। सेनाएं हारती-जीतती रहीं। शासक बदलते रहे। वजह सिर्फ एक ही था आपसी फुट,आपसी कलह। आज भी हम इसी राह पर चल रहे है पहले आपसी लड़ाइ में किताब का कोई सहारा न था और आज जब इसका सहारा मिला है तो हम इसका उपयोग मात्र सत्ता के लिए कर रहे है पहले इस लड़ाई का उपयोग परदेशी उठाते है और आज घर के ही लोग उठा रहे है, इस अफरा-तफरी,इस बेचैनी,इस उहा पोह से गैर जिम्मेदार वातावरण का निर्माण हो रहा है जो व्यवस्था के हर हिस्से को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है चाहे वो मीडिया हो,व्यापारी वर्ग हो या प्रशासन...सब बीमार हो रहे है!!!
भारतीय लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। इसी माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। ‘संसदीय’ शब्द का अर्थ ही ऐसी लोकतंत्रात्मक राजनीतिक व्यवस्था है जहां सर्वोच्च शक्ति लोगों के प्रतिनिधियों के उस निकाय में निहित है जिसे ‘संसद’ कहते हैं। यह वह धुरी है,जो देश के शासन की नींव है। जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था होने के नाते इसकी कार्य प्रणाली जिम्मेदार होनी चाहिए जिससे देशहित और आम जनता के उत्थान के लिए कार्य हो सके, ऐसा बिलकुल न हो की दलगत राजनीती और सत्ता प्रेम के लिए जब चाहे संसद का शटर डाउन कर दे। संसद को पार्टनरशिप कंपनी न बनने दे...वन्दे मातरम...
Friday, May 10, 2013
मामा भांजा स्पेशल...
पुराणों के अनुसार द्वापर युग के बारे में कहा
गया है की इस युग में पृथ्वी
पर पाप कर्म बढ़ गए थे और भगवान श्री कृष्ण का अवतार एवं महाभारत
का युद्ध भी इसी युग में हुआ था। हमारे आर्यावर्त के इतिहास में मामा भांजा
के रिश्ते हमेशा से ही लोभ,लालच और पारिवारिक भ्रष्टाचार की प्रतिक मानी
जाती रही है। महाभारत में शकुनि मामा का जलवा किसको ज्ञात नहीं
है जिन्होंने धर्म और अधर्म के चौसर में भ्रष्टाचार को इतना भावुक रूप दिया
की करुक्षेत्र की मिटटी आज तक लहू लुहान है। पुराण के द्वापर युग और आज के
वन्दे मातरम युग में अंतर मात्र इतना है की आज धर्म की सम्पूर्णता का
आंकलन करने वाला कोई नहीं है सब करुक्षेत्र की मिटटी बन चुके है तो अधर्म
के दुष्परिणाम की प्रत्याशा कौन करेगा। भ्रष्टाचार तो बस अधर्म का एहसान और
रवायत का बड़ी शिद्दत से निर्वाह कर रहा है,नारायणी सेना भी साथ है।
रेल घुंस काण्ड भी इसी इसी परंपरा की झलक है जो दर्शाती है की भ्रस्टाचार का जन्म घर में होता है और राजनीती में आकर जवां होती है। जैसे शीला की जवानी के मजे सपरिवार उठाते है वैसे ही इसकी जवानी के भी लुत्फ़ उठाये,हर्ज़ क्या है ? बुद्धिजीवियों के खेल शतरंज में प्यादा की स्थिति यथावत ही है सिर्फ बुद्धिजीवियों की पीढियाँ बदली है...चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शारीर, पर लोभ से लक्ष्मी बढे, कहाँ गए अब दास कबीर..:-)
रेल घुंस काण्ड भी इसी इसी परंपरा की झलक है जो दर्शाती है की भ्रस्टाचार का जन्म घर में होता है और राजनीती में आकर जवां होती है। जैसे शीला की जवानी के मजे सपरिवार उठाते है वैसे ही इसकी जवानी के भी लुत्फ़ उठाये,हर्ज़ क्या है ? बुद्धिजीवियों के खेल शतरंज में प्यादा की स्थिति यथावत ही है सिर्फ बुद्धिजीवियों की पीढियाँ बदली है...चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शारीर, पर लोभ से लक्ष्मी बढे, कहाँ गए अब दास कबीर..:-)
Friday, May 3, 2013
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो मिटटी बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो मिटटी बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो आंशु बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो सिर्फ सुपुर्द ए खाक होने
क्या अब हममे इतनी ही शक्ति बची है की अपनों के अर्थियों का सहारा बन सके
क्या चुक हुई जो राजनीती हत्यारा बन गया
क्या चुक हुई जो इंसानियत दर्द का पिटारा बन गया
सरहदों को क्या मालूम रक्त का व्यवसाय होता है वहां
सरहदों को क्या मालूम जिंदगी असहाय होता है वहां
सरहदों को क्या मालूम छल की रवायत है वहां
सरहदों को क्या मालूम जिंदगी के आगे जिंदगी दम तोडती है वहां
क्या चुक हुई जो जय हिन्द की उर्जा काम न आई
क्या चुक हुई जो वन्दे मातरम बेसहारा बन गया
२५ साल कितनी मंडली आई कितनी मंडली गयी
अगर यह निर्दोष था क्यों इसे बचाया न गया राजकीय शोक से फिर छुपाया जा रहा है राजनीती के इस अपराध को
क्या चुक हुई जो राजनीती से मौत के खेल को हटाया न गया
अगर मलिन हो चुकी है राजनीती तो ख़त्म करो इस रिश्ते को
अगर दीन हो चुकी है कूटनीति तो दफ़्न करो दिखावे के इस गुलदस्ते को
मौत पे रोने की परंपरा है पर आँखों को क्या पता इस अनर्थ का
आंशुओं को क्या पता की किस बूंद में गम की पीड़ा है और किस बूंद में दिखावा
जुटेंगे लोग मिटटी को मिटटी में मिलाने को
एक और अपराध,एक और कत्ल दफनाने को
बोलियाँ फिर लगेंगी कल से सत्ता के सुनहरे बाजार में इंसानों की
बंदरबांट में जुटे यहाँ किसको चिंता है भारत/भारती के संतानों की
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो मिटटी बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो आंशु बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो सिर्फ सुपुर्द ए खाक होने...
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो आंशु बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो सिर्फ सुपुर्द ए खाक होने
क्या अब हममे इतनी ही शक्ति बची है की अपनों के अर्थियों का सहारा बन सके
क्या चुक हुई जो राजनीती हत्यारा बन गया
क्या चुक हुई जो इंसानियत दर्द का पिटारा बन गया
सरहदों को क्या मालूम रक्त का व्यवसाय होता है वहां
सरहदों को क्या मालूम जिंदगी असहाय होता है वहां
सरहदों को क्या मालूम छल की रवायत है वहां
सरहदों को क्या मालूम जिंदगी के आगे जिंदगी दम तोडती है वहां
क्या चुक हुई जो जय हिन्द की उर्जा काम न आई
क्या चुक हुई जो वन्दे मातरम बेसहारा बन गया
२५ साल कितनी मंडली आई कितनी मंडली गयी
अगर यह निर्दोष था क्यों इसे बचाया न गया राजकीय शोक से फिर छुपाया जा रहा है राजनीती के इस अपराध को
क्या चुक हुई जो राजनीती से मौत के खेल को हटाया न गया
अगर मलिन हो चुकी है राजनीती तो ख़त्म करो इस रिश्ते को
अगर दीन हो चुकी है कूटनीति तो दफ़्न करो दिखावे के इस गुलदस्ते को
मौत पे रोने की परंपरा है पर आँखों को क्या पता इस अनर्थ का
आंशुओं को क्या पता की किस बूंद में गम की पीड़ा है और किस बूंद में दिखावा
जुटेंगे लोग मिटटी को मिटटी में मिलाने को
एक और अपराध,एक और कत्ल दफनाने को
बोलियाँ फिर लगेंगी कल से सत्ता के सुनहरे बाजार में इंसानों की
बंदरबांट में जुटे यहाँ किसको चिंता है भारत/भारती के संतानों की
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो मिटटी बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो आंशु बनकर
क्या चुक हुई जो वतन का लाल घर लौटा तो सिर्फ सुपुर्द ए खाक होने...
Thursday, May 2, 2013
परिवर्तन है चीत्कार कर रहा
बार बार कोंख क्यों है शर्मशार हो रहा
अजन्मी बेटियों पे वार बारम्बार हो रहा
ममता की अस्मत तार तार हो रहा
क्या हो गया है इस संसार को
इंसानियत क्यों है बीमार हो रहा
बार बार कोंख क्यों है शर्मशार हो रहा
अजन्मी बेटियों पे वार बारम्बार हो रहा
क्यों देखती है आँखें इनको अलग थलग
जन्म देने वाला ही मौत का क्यों पैकार बन रहा
और जो बेटियाँ है इस जहां में
क्यों इनपे इतना है अत्याचार हो रहा
रिश्तो की डोर से बंधे इस समाज को
रिश्तो से ही क्यों अब सरोकार न रहा
क्या हो गया है इस समाज को
इंसानियत है क्यों नीलाम हो रहा
वक़्त है एक सच्ची आवाज़ की
स्वस्थ रिश्तों की आगाज़ की
बेटियों के तख्तोताज की
एक जिम्मेदार समाज की
परिवर्तन है चीत्कार कर रहा
परिवर्तन है चीत्कार कर रहा...
अजन्मी बेटियों पे वार बारम्बार हो रहा
ममता की अस्मत तार तार हो रहा
क्या हो गया है इस संसार को
इंसानियत क्यों है बीमार हो रहा
बार बार कोंख क्यों है शर्मशार हो रहा
अजन्मी बेटियों पे वार बारम्बार हो रहा
क्यों देखती है आँखें इनको अलग थलग
जन्म देने वाला ही मौत का क्यों पैकार बन रहा
और जो बेटियाँ है इस जहां में
क्यों इनपे इतना है अत्याचार हो रहा
रिश्तो की डोर से बंधे इस समाज को
रिश्तो से ही क्यों अब सरोकार न रहा
क्या हो गया है इस समाज को
इंसानियत है क्यों नीलाम हो रहा
वक़्त है एक सच्ची आवाज़ की
स्वस्थ रिश्तों की आगाज़ की
बेटियों के तख्तोताज की
एक जिम्मेदार समाज की
परिवर्तन है चीत्कार कर रहा
परिवर्तन है चीत्कार कर रहा...
Saturday, April 27, 2013
M.A.R.D
दिल्ली की ५ वर्ष की बच्ची के बलात्कार का मामला और दिल्ली में ही एक अदालत ने 61 वर्षीय व्यक्ति को अपनी प्रेग्नेंट बहू से जबरन संबंध बनाने और उसे सूइसाइड के लिए उकसाने के आरोप में 10 साल कैद की सजा सुनाई। इस प्रकार के मामले इस बात के घोतक है की बलात्कार के ज्यादातर मामलों में परिचित या रिश्तेदार ही मुख्य भूमिका निभा रहे है, इसलिए यह मामला सिर्फ कानून व्यवस्था को कोसने का ही नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों और संस्कार का भी है। हमारे सामाजिक ढांचे में कोई बुराई जरूर है। जब कोई महिला अपने घर में ही सुरक्षित नहीं तो वह बाहर कैसे सुरक्षित रह पाएगी।
सामाजिक ढांचे से जुडी बलात्कार रूपी कर्क रोग को दुनिया की कोई भी कानून व्यवस्था सुधार नहीं सकती। दिखाई देने वाले जख्म का उपचार किया जा सकता है लेकिन जो जख्म समाज के रंगीन परदे से ढका हो उसका इलाज सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था ही कर सकता है,इसके लिए पुलिस और कानून व्यवस्था को पूर्ण रूप से दोषी ठहराना एक तरीके से समाज के रंगीन परदे से ढके खोकली मानसिकता का समर्थन करना है.
विकास और आधुनिकता के नशे में धुत हमारी भारतीय समाज आज नेत्रहीन हो चुकी है.महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की बात आज हम सब कर रहे है लेकिन उसी महल में जहाँ शीला की जवानी,मुन्नी को बदनाम होते देखकर और फिर उसके फोटो को अपने दिल में फेविकोल से चिपकाकर सपरिवार मनोरंजित होते है और अगर इससे भी मन नहीं भरा तो फिर आ रे प्रीतम प्यारे बन्दुक में न तो गोली मेरे, सब आग तो मेरी चोली में रे,जरा हुक्का उठा जरा चिल्लम जला,पल्लू के नीचे छुपा के रखा है,उठा दूं तो हंगामा हो इस उबाऊ जिंदगी को या हमारे सामाजिक समारोहों में चार चाँद तो लगा ही देगा.
आर्यावर्त की संस्कृति और पश्चिमी सभ्यता हमेशा से ही दो अलग मानसिकता रही है और इसका मुख्य कारण है प्रकृति यानि जलवायु ,ऋतु एवं आबोहवा। विकास के फोर्मुले में पाश्चात्यकरण आवश्यक है लेकिन किस हद तक ? पाश्चात्यकरण के बढ़ते प्रभाव व आधुनिकता का भूत आज इस कद्र हावी है कि टेलीविजन में,समारोहों में, फिल्मो में तथा अन्य कार्यक्रमों में महिलाओं को ऐसे अश्लील परिधानों में प्रदर्शित किया जाता है मानो महिलाओं की मानसिक आजादी का मतलब तन को ढकना कम तथा दर्शाना अधिक है। कोई भी विज्ञापन, किसी चैनल की एंकरिंग तथा अन्य कार्यक्रम तब तक पूर्ण नहीं होते, जब तक अश्लील तरीके से तथा अधूरे वस्त्र पहनी हुई लड़कियां उसमें शामिल नहीं होतीं। अब ये लड़कियों व महिलाओं को सोचना चाहिए कि क्या उनकी मान-मर्यादा इतनी सस्ती व बिकाऊ है कि चंद पैसों के लिए उसका हनन हो। महिलाओं को भी ये सोचना होगा की उनका इस्तेमाल किसी वस्तु की तरह न हो। विकास,आधुनिकता एवं पाश्चात्यकरण के त्रिकोणीय समीकरण में स्त्री और स्त्रीत्व का व्यवसायीकरण न हो। कल एक टेलीविजन चैनल पर M.A.R.D {Men Against Rape and Discrimination} नामक महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा से संवंधित सोशल कैम्पेन देखने को मिला। इसका LOGO है...

इसमें मुछ को मर्द की भावनाओ से जोड़कर एक जागरूकता की अलख जगाने की कोशिश की गयी है. हमारे समाज में मुछ को बड़ी तरजीह दी गयी है और इसको मर्दानगी का प्रतिक माना गया है लेकिन भारत को छोड़ अन्य पश्चिमी देशो में मुछ मर्द का LOGO नहीं है लेकिन वहां महिलाओं की इतनी दुर्गति नहीं है जितनी की हमारे देश में है-क्यों? क्योंकि वहां के कायदे कानून वहां के आबोहवा के अनुसार बनाया गया है. M.A.R.D- ये एक अच्छा प्रयास है लेकिन ये सोशल कैम्पेन सिर्फ मर्दों को जिम्मेदार बना रहा है जबकि हमारी समाजिक संरचना इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है जिसने मुछो को मर्दानगी का थर्मामीटर बनाया है. अगर इस सोशल कैम्पेन का टैगलाइन Society Against Rape and Discrimination(सोसाइटी अगेंस्ट रेप एंड डिस्क्रिमिनेशन ) होता तो शायद समाज को अपनी जिम्मेदारी और बलात्कार जैसे मानवीय अपमान की पीड़ा का एहसास कराने में ज्यादा कारगर सिद्ध होता। किसी भी प्रकार के प्रयास में शुरुआत इसकी दीपक की लौ होती है और इतनी जल्दी रौशनी की आशा भी नहीं करनी चाहिए। विश्व के एक-तिहाई गरीब भारत में हैं, जो रोजाना 1.25 डालर (करीब 65 रुपये) से कम में जीवन-यापन करते हैं और यहाँ दो टाइप का समाज है एक खाप पंचायत और दूसरा खाक पंचायत। हमारे देश का सामाजिक ढांचा आज तक गरीब भारत,खाप और ख़ाक के बीच समन्वय नहीं बिठा पाया है और अब यह देखना दिलचस्प होगा की हमारा समाज महिलाओं की दुर्गति जैसे संवेदनशील मुद्दे का हल कितनी परिपक्वता से निकाल पाता है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य द्वारा किये गए हर अपराध की जिम्मेदारी पुरे समाज को लेनी पड़ेगी,सिर्फ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर,कानून व्यवस्था,नेता या सरकार पर दोष मढ़ संगम स्नान का फल नहीं मिल सकता।
सामाजिक ढांचे से जुडी बलात्कार रूपी कर्क रोग को दुनिया की कोई भी कानून व्यवस्था सुधार नहीं सकती। दिखाई देने वाले जख्म का उपचार किया जा सकता है लेकिन जो जख्म समाज के रंगीन परदे से ढका हो उसका इलाज सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था ही कर सकता है,इसके लिए पुलिस और कानून व्यवस्था को पूर्ण रूप से दोषी ठहराना एक तरीके से समाज के रंगीन परदे से ढके खोकली मानसिकता का समर्थन करना है.
विकास और आधुनिकता के नशे में धुत हमारी भारतीय समाज आज नेत्रहीन हो चुकी है.महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की बात आज हम सब कर रहे है लेकिन उसी महल में जहाँ शीला की जवानी,मुन्नी को बदनाम होते देखकर और फिर उसके फोटो को अपने दिल में फेविकोल से चिपकाकर सपरिवार मनोरंजित होते है और अगर इससे भी मन नहीं भरा तो फिर आ रे प्रीतम प्यारे बन्दुक में न तो गोली मेरे, सब आग तो मेरी चोली में रे,जरा हुक्का उठा जरा चिल्लम जला,पल्लू के नीचे छुपा के रखा है,उठा दूं तो हंगामा हो इस उबाऊ जिंदगी को या हमारे सामाजिक समारोहों में चार चाँद तो लगा ही देगा.
आर्यावर्त की संस्कृति और पश्चिमी सभ्यता हमेशा से ही दो अलग मानसिकता रही है और इसका मुख्य कारण है प्रकृति यानि जलवायु ,ऋतु एवं आबोहवा। विकास के फोर्मुले में पाश्चात्यकरण आवश्यक है लेकिन किस हद तक ? पाश्चात्यकरण के बढ़ते प्रभाव व आधुनिकता का भूत आज इस कद्र हावी है कि टेलीविजन में,समारोहों में, फिल्मो में तथा अन्य कार्यक्रमों में महिलाओं को ऐसे अश्लील परिधानों में प्रदर्शित किया जाता है मानो महिलाओं की मानसिक आजादी का मतलब तन को ढकना कम तथा दर्शाना अधिक है। कोई भी विज्ञापन, किसी चैनल की एंकरिंग तथा अन्य कार्यक्रम तब तक पूर्ण नहीं होते, जब तक अश्लील तरीके से तथा अधूरे वस्त्र पहनी हुई लड़कियां उसमें शामिल नहीं होतीं। अब ये लड़कियों व महिलाओं को सोचना चाहिए कि क्या उनकी मान-मर्यादा इतनी सस्ती व बिकाऊ है कि चंद पैसों के लिए उसका हनन हो। महिलाओं को भी ये सोचना होगा की उनका इस्तेमाल किसी वस्तु की तरह न हो। विकास,आधुनिकता एवं पाश्चात्यकरण के त्रिकोणीय समीकरण में स्त्री और स्त्रीत्व का व्यवसायीकरण न हो। कल एक टेलीविजन चैनल पर M.A.R.D {Men Against Rape and Discrimination} नामक महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा से संवंधित सोशल कैम्पेन देखने को मिला। इसका LOGO है...
इसमें मुछ को मर्द की भावनाओ से जोड़कर एक जागरूकता की अलख जगाने की कोशिश की गयी है. हमारे समाज में मुछ को बड़ी तरजीह दी गयी है और इसको मर्दानगी का प्रतिक माना गया है लेकिन भारत को छोड़ अन्य पश्चिमी देशो में मुछ मर्द का LOGO नहीं है लेकिन वहां महिलाओं की इतनी दुर्गति नहीं है जितनी की हमारे देश में है-क्यों? क्योंकि वहां के कायदे कानून वहां के आबोहवा के अनुसार बनाया गया है. M.A.R.D- ये एक अच्छा प्रयास है लेकिन ये सोशल कैम्पेन सिर्फ मर्दों को जिम्मेदार बना रहा है जबकि हमारी समाजिक संरचना इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है जिसने मुछो को मर्दानगी का थर्मामीटर बनाया है. अगर इस सोशल कैम्पेन का टैगलाइन Society Against Rape and Discrimination(सोसाइटी अगेंस्ट रेप एंड डिस्क्रिमिनेशन ) होता तो शायद समाज को अपनी जिम्मेदारी और बलात्कार जैसे मानवीय अपमान की पीड़ा का एहसास कराने में ज्यादा कारगर सिद्ध होता। किसी भी प्रकार के प्रयास में शुरुआत इसकी दीपक की लौ होती है और इतनी जल्दी रौशनी की आशा भी नहीं करनी चाहिए। विश्व के एक-तिहाई गरीब भारत में हैं, जो रोजाना 1.25 डालर (करीब 65 रुपये) से कम में जीवन-यापन करते हैं और यहाँ दो टाइप का समाज है एक खाप पंचायत और दूसरा खाक पंचायत। हमारे देश का सामाजिक ढांचा आज तक गरीब भारत,खाप और ख़ाक के बीच समन्वय नहीं बिठा पाया है और अब यह देखना दिलचस्प होगा की हमारा समाज महिलाओं की दुर्गति जैसे संवेदनशील मुद्दे का हल कितनी परिपक्वता से निकाल पाता है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य द्वारा किये गए हर अपराध की जिम्मेदारी पुरे समाज को लेनी पड़ेगी,सिर्फ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर,कानून व्यवस्था,नेता या सरकार पर दोष मढ़ संगम स्नान का फल नहीं मिल सकता।
Sunday, March 17, 2013
रविवासरीय
इस वित्त वर्ष में सरकार द्वारा टैक्स की सीमा में छुट
तो नहीं मिली लेकिन सेक्स की उम्र सीमा में छूट जरूर मिली है। शादी की
योग्यता महिलाओ के लिए 18 वर्ष ,पुरुषो के लिए 21 वर्ष और सहमती से सेक्स
के लिए योग्यता 16 वर्ष? ये छूट हमारी संस्कृति में अपराध और अपराधी के
बीच चाइनीज खेल सु -डोकु जैसा है। सहमती से सेक्स के लिए योग्यता 16 वर्ष
महिलाओं की सुरक्षा कितना सुनिश्चित करेगा ये आने वाला वक़्त ही बतायेगा
लेकिन आने वाले चुनावी मुकाबले में मुंह मिया मिट्ठू बनने के लिए ये 16 वर्ष की बाली उमर फिट है बॉस।
सरकार जो एंटी रेप कानून बनाने वाली है वो अपराध और अपराधी दोनों का एक नया चेहरा प्रस्तुत करेगा,अब तक तो अधिकांशतः पुरुष सेक्स मतभेद से जुड़े अपराध में लिप्त पाए जाते रहे है लेकिन अब इस कानून से महिलाए भी चाइनीज खेल सु -डोकु खेलते नजर आने वाले है। इंसान हमेशा निति निर्धारण की आड़ में स्थिति-निर्धारण करता आया है और फिर ये स्थिति तो मौके पे चौक लगाने जैसा है,ये नया वाला लेकिन अस्पष्ट एंटी रेप बिल सेक्स मतभेद में महिलाओं को भी अपराधी बना दे तो इसमें कोई अश्चर्य नहीं होनी चाहिए। नव विभाजित इंडिया और भारत के समाज में अगर सेक्स मतभेद के प्रति सोच अगर यथावत रही तो आप कितनी भी कानून ले आइये कुछ परिवर्तित होने वाला नहीं है।
आइये अब थोडा दुरे विषय पे चर्चा करते है। जैसा की आप सभी देखें ही होंगे ,दिल्ली की रामलीला मैदान आज एक बार फिर लोगो के हुजूम के साथ अस्त व्यस्त दिखा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में विशेष राज्य का दर्जा की मांग के लिए अधिकार रैली किया। रैली के राजनितिक मायने क्या होंगे और इस रैली से विशेष राज्य का दर्जा की मांग का कितना असर होगा ये तो आने वाले लोकसभा चुनाव की ज्यामिति पर निर्भर होगी। लेकिन श्री नितीश कुमार की आज की भाषण से ऐसा लगा की उनकी ये मांग तत्कालीन स्थितियों को भुनाने के लिए नहीं है। पहली बार बिहार के किसी नेता ने सांख्यिकी के गहन अध्यन के साथ और उसका आधार बनाकर अपनी मांग रख रहा है। उनके संबोधन के मुताबिक बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। विकास के लिए प्रति व्यक्ति खर्च राष्ट्रीय औसत से आधा है। मानवीय विकास सूचकांक में भी बिहार पीछे है। विकास हर इंसान का अधिकार है। ऐसी स्थिति में बिहार के लिए केंद्र को विशेष क्यों नहीं सोचना चाहिए? एक जमाने में सत्ता बिहार से चलती थी। जी हाँ चाणक्य तो स्मृति में होंगे ही!
वैसे दोस्तों दुनिया भर में जहाँ भी लोकतंत्र है,सभी राजनीतिज्ञ जानते है की लोकतंत्र में आम जनता बड़ी नोट है और इसके खुल्ले कैसे करवाने है। चाहे वो खुल्ला चुनावी घोषणा पत्र के जरिये हो या फिर मीडिया पर सीधी बात नो बकवास के जरिये। पर एक बार अगर बड़ी नोट के खुल्ले हो जाये तो पैसे की क्या हश्र होती है तो ये तो हम जानते ही है। पैसेंजर ट्रेन अचानक राजधानी की गति में तब्दील हो जाती है। आज हमारे देश में संबिधान का भी हाल आम जनता जैसा ही यानी बड़ी नोट हो चला है। हमारे लोकतंत्र का हर राजनीतिज्ञ इस बड़ी नोट के खुल्ले की फिराक में लगा है,सहमती बना ले तो बड़ी नोट थोड़ी बड़ी होकर तो जरूर बच जायेगी।
साहिल की रेत पर यूँ लेहेर उठा ये दिल,सागर में उठनेवाली हर लेहेर को सलाम-सोलह बरस की बाली उम्र को सलाम।।
शुभ रात्रि..:):)
सरकार जो एंटी रेप कानून बनाने वाली है वो अपराध और अपराधी दोनों का एक नया चेहरा प्रस्तुत करेगा,अब तक तो अधिकांशतः पुरुष सेक्स मतभेद से जुड़े अपराध में लिप्त पाए जाते रहे है लेकिन अब इस कानून से महिलाए भी चाइनीज खेल सु -डोकु खेलते नजर आने वाले है। इंसान हमेशा निति निर्धारण की आड़ में स्थिति-निर्धारण करता आया है और फिर ये स्थिति तो मौके पे चौक लगाने जैसा है,ये नया वाला लेकिन अस्पष्ट एंटी रेप बिल सेक्स मतभेद में महिलाओं को भी अपराधी बना दे तो इसमें कोई अश्चर्य नहीं होनी चाहिए। नव विभाजित इंडिया और भारत के समाज में अगर सेक्स मतभेद के प्रति सोच अगर यथावत रही तो आप कितनी भी कानून ले आइये कुछ परिवर्तित होने वाला नहीं है।
आइये अब थोडा दुरे विषय पे चर्चा करते है। जैसा की आप सभी देखें ही होंगे ,दिल्ली की रामलीला मैदान आज एक बार फिर लोगो के हुजूम के साथ अस्त व्यस्त दिखा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में विशेष राज्य का दर्जा की मांग के लिए अधिकार रैली किया। रैली के राजनितिक मायने क्या होंगे और इस रैली से विशेष राज्य का दर्जा की मांग का कितना असर होगा ये तो आने वाले लोकसभा चुनाव की ज्यामिति पर निर्भर होगी। लेकिन श्री नितीश कुमार की आज की भाषण से ऐसा लगा की उनकी ये मांग तत्कालीन स्थितियों को भुनाने के लिए नहीं है। पहली बार बिहार के किसी नेता ने सांख्यिकी के गहन अध्यन के साथ और उसका आधार बनाकर अपनी मांग रख रहा है। उनके संबोधन के मुताबिक बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। विकास के लिए प्रति व्यक्ति खर्च राष्ट्रीय औसत से आधा है। मानवीय विकास सूचकांक में भी बिहार पीछे है। विकास हर इंसान का अधिकार है। ऐसी स्थिति में बिहार के लिए केंद्र को विशेष क्यों नहीं सोचना चाहिए? एक जमाने में सत्ता बिहार से चलती थी। जी हाँ चाणक्य तो स्मृति में होंगे ही!
वैसे दोस्तों दुनिया भर में जहाँ भी लोकतंत्र है,सभी राजनीतिज्ञ जानते है की लोकतंत्र में आम जनता बड़ी नोट है और इसके खुल्ले कैसे करवाने है। चाहे वो खुल्ला चुनावी घोषणा पत्र के जरिये हो या फिर मीडिया पर सीधी बात नो बकवास के जरिये। पर एक बार अगर बड़ी नोट के खुल्ले हो जाये तो पैसे की क्या हश्र होती है तो ये तो हम जानते ही है। पैसेंजर ट्रेन अचानक राजधानी की गति में तब्दील हो जाती है। आज हमारे देश में संबिधान का भी हाल आम जनता जैसा ही यानी बड़ी नोट हो चला है। हमारे लोकतंत्र का हर राजनीतिज्ञ इस बड़ी नोट के खुल्ले की फिराक में लगा है,सहमती बना ले तो बड़ी नोट थोड़ी बड़ी होकर तो जरूर बच जायेगी।
साहिल की रेत पर यूँ लेहेर उठा ये दिल,सागर में उठनेवाली हर लेहेर को सलाम-सोलह बरस की बाली उम्र को सलाम।।
शुभ रात्रि..:):)
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