Negative Attitude

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Saturday, October 6, 2012

कामुक सब्सिडी

आजकल सब्सिडी के नाम पर पुरे देश में हंगामा मचा हुआ है.देश का प्रत्येक राजनीतिज्ञ सब्सिडी की सुन्दरता को अपने अपने तरीके से वयां करने में मशरूफ है.स्वतंत्रता के बाद जो भी सरकार सत्ता में आयी,सब्सिडी देती आ रही है.लेकिन सोचने बाली बात ये है की क्या सब्सिडी सच में गरीब जनता का बोझ कम कर रही है? आज तक हमारी सरकार गरीबो की परिभाषा या यूँ कहे हमारे देश की गरीबी तय नहीं कर पायी है तो फिर ये विशालकाय सब्सिडी किस मापदंड पर निर्धारित की जा जाती है.पेट्रोल,डीजल और अन्य संसाधन का दाम बढ़ाये जाने पर हर बार सरकार सब्सिडी के वजह से होने वाले आर्थिक नुकसान का रोना रोती है और मूल्य वृद्धि को जायज ठहराती है.जहा तक सरकार का कहना है,पेट्रोल डीजल एवं अन्य प्रकृतिक संसाधन का लगभग 70-75% आयात करना पडता है और सरकार इन पर सब्सिडी देती है [सही है] ताकि गरीब जनता के उपर ज्यादा बोझ ना पड़े.परंतु जो आर्थिक सहायता या अनुदान सरकार गरीब जनता के नाम पर दे रही है जिसे सरकार सब्सिडी कहती है क्या उसका लाभ सचमुच मे गरीबो को ही मिल रहा है ? क्या संपन्न-अमीर लोग गरीब जनता के नाम पर सब्सिडी का लाभ नही ले रहे ? 

आज हमारे देश मे सवा अरब की जनता मे लगभग 35 से 45 करोड़ लोग संपन्न हैं,क्या इन्हे सब्सिडी जायज है ? सरकार अगर गरीबी नही तय कर सकती तो अमीरी तो तय कर सकती है? सरकारी आकड़ो के अनुसार सब्सिडी के ऊपर वर्ष 2006-07 में लगभग 57,125 करोड़ रुपये के मुकाबले वर्ष 2011 -12 यही लगभग 2.16 लाख करोड़ रुपये खर्च किये गए.अब जरा सोचिये सब्सिडी के वृद्धि के साथ महंगाई थोड़ी बहुत नियंत्रित रहनी चाहिए थी परन्तु महंगाई दिन ब दिन बढती ही जा रही है.मतलब यह बात तो स्पष्ट है की सब्सिडी पे निर्भर होकर महंगाई पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता? बाजार जो कीमत तय करती है उसपर सब्सिडी कोई सार्थक प्रभाव नहीं ड़ाल सकती है.तो फिर प्रश्न यह उठता है की इसका हल क्या है? हमारी राय में इसका हल है सब्सिडी की जरूरतों का वर्गीकरण करना जो कोई भी सरकार आज तक स्वीकार नहीं कर पायी है क्योंकी किसी ने सच ही कहा था,किसी झूठ को जोर से और बार-बार बोलो तो वह सत्य लगने लगता है.सब्सिडी भी भारतीय राजनीती में जनता के लिए वैसा ही सत्य लगने वाला झूठ है या यूँ कहे की सब्सिडी भारतीय राजनीती की रखैल है जो जब चाहे अपने लाभ के इस्तेमाल कर सकता है? भारतीय लोकतंत्र में राजनीती अगर व्यवसाय हो गया है तो सब्सिडी भारतीय राजनीती का प्रोडक्ट है और देश की हर राजनितिक पार्टियाँ सब्सिडी को अपने लाभ के लिए जनता के समक्ष अच्छी तरह से इसका विपणन करती आ रही है.चुनावी घोषणा पत्र क्या है,सब्सिडी के बदौलत ही तो जनता को रिझाये जाते है? कोई लैपटॉप देने का वायदा,कोई अनाधिकृत जमीन को अधिकृत करने का वायदा तो कोई अल्पसंख्यको के विकास के लिए अतिरिक्त पॅकेज का वायदा इत्यादि इत्यादि...देश की हर पार्टी अपने अपने प्रतियोगियों की तुलना में रचनात्मक चुनावी घोषणा पत्र के जरिये जनता को लुभाती है..कैसे?...अपनी वही रखैल(सब्सिडी) के बदौलत....कोई भी पार्टी आज तक राजकीय कोष का न्यायसंगत इस्तेमाल नहीं कर पायी है और न ही करने का इरादा रखती है...इस देश में राजनीती से जुडा हर सख्श  गरीब आदमी के नाम पर सब्सिडी का विपणन करने में लगा है...अगर सब्सिडी इतनी कारगर होती तो गरीबो की तादाद कम होनी चाहिए थी लेकिन संपन्न लोगो के मुकाबले गरीबों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती चली जा रही है? आजादी के ६५ वर्ष बाद भी हर राजनितिक पार्टी जन वितरण प्रणाली को दुरुश्त करने में नाकाम रही है,इस जन वितरण प्रणाली के जरिये गरीबों को बुनियादी आवश्यकताएँ मुहैया करने के नाम पर सब्सिडी से हजारो करोड़ रुपये की हर साल लूट होती है लेकिन गरीबों को क्या मिलता है...सिर्फ और सिर्फ ठेंगा??? 

हमारी राय में सब्सिडी की परिकल्पना को पुनः परिभाषित करने की जरूरत है? सब्सिडी को जरूरतों के मुताबिक वर्गीकरण करना होगा? नहीं तो सरकार सब्सिडी के नाम पर जो टैक्स की लूट मचा रखी है वो कभी बंद नहीं होगी...अगर तिरोभूत टैक्स देखे तो हमारे देश में इसका मकड़ जाल है जो सरकार सिर्फ इस तर्क पे वसूलती है की हमारे पास सब्सिडी का बोझ है?? निर्माता की लागत और उपभोक्ता कीमतों को पूरी तरह से बाजार को सौप दिया जाना चाहिए...बाजार को ही कीमत तय करने दे...हमारे देश में सब्सिडी जब तक रहेगी विकाशशील से विकसित कभी नहीं हो पायेंगे...सब्सिडी जब तक रहेगा राजनितिक पार्टियाँ कभी भी देशहित या जनहित के लिए अच्छा एवं रचनात्मक कार्य नहीं करेंगी...राजनीतिज्ञों को उनके भविष्य सुरक्षित करने के लिए सब्सिडी है ना...जनता के समक्ष राजनीतिज्ञ समय समय पर सब्सिडी को कामुक अंदाज में पेश एवं विपणन करती रहेंगी...गरीबों या देश की किसको पड़ी है?


सब्सिडी..हलकट जवानी


अरे! बस्ती में डेली बवाल करे..
हाए..नेताओं की नीयत हलाल करे..
आईटम बना के रख ले...
चखना बना के चख ले...
मीठा यह नमकीन पानी..
यह हलकट जवानी,यह हलकट जवानी...

Wednesday, October 3, 2012

गांधी-गीरी

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी गाँधी जयंती मनाया गया.हाँ यह बात अलग है की आम आदमी के लिए इसके मायने क्या है? एक महान व्यक्ति को याद कर उनका सम्मान करना या भाग दौड़ भरी जिंदगी में तय एक छुट्टी का दिन.बदलते राजनितिक परिवेश और आधुनिकता के दौर से गुजरते समय में गाँधी जयंती एवं उनके आदर्शो का सम्मान अब बस औपचारिकता मात्र रह गयी है.एक संकल्पवान सख्शियत जिनकी अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ आस्था ने आन्दोलन शब्द को एक अलग पहचान दिया,एक चेहरा दिया,हर खाश ओ आम को उनके अपनी आवाज़ की शक्ति का अहसास दिलाया और यह भरोसा जब समूहों में एकत्रित हुआ तो आज़ादी के तख़्त-ओ-ताज  के साथ साथ सरहदों का भी अम्बार लग गया.सच्चे आन्दोलन की ताक़त का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है.लेकिन आज हमारे देश में आन्दोलन गांधीगिरी से शरू तो होता है पर बिना परिणाम के इसी गांधीगिरी के बीच तड़पकर दम भी तोड़ देता है.आन्दोलन अब एक व्यवसाय बन चुका है.भ्रस्टाचार,महंगाई,आरक्षण या भारतीय बाजारों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मुद्दा. आन्दोलन करे तो किस चीज के लिए? प्राथमिकता दे तो किसको? राजनीती और राजनितिक मजबुरी के बीच आम आदमी की जरूरत राजनीती के बाजार में बार बार नीलाम होती है.हर पार्टी आम आदमी की जरूरत को अपने अपने चश्मे की लियाकत के अनुसार देखती है.किसी की नजदीक की दृष्टि कमजोर है तो किसी की दूर की दृष्टि.राजनीती का दृष्टि दोष इस विशालकाय प्रजातंत्र को क्या दिशा प्रदान कर पाएगी? राजनीती में या तो उन्नत किस्म के चश्मे की जरूरत है या वैसे व्यक्तियों की जिनको दृष्टि दोष हो ही ना? एक आन्दोलन की कितनी सहजता से मृत्यु हो गयी इसका अंदाजा श्री अरविन्द केजरीवाल की नवगठित पार्टी सम्मलेन में आम आदमी छपी टोपी पहने कार्यकर्ताओं से अब अच्छी तरह लगाया जा सकता है.यही कार्यकर्ता चंद महीने पहले गांधीवादी विचारधारा को सर आँखों पे बिठाकर आन्दोलन की ताक़त प्रदर्शित किया करते थे.गांधीगीरी आज गाँधी के समक्ष ही दम तोडती नजर आ रही है.बाजार में बिचौलिए तो सभी स्वीकार करते है और इसको स्वीकार करने की ठोश वजह भी समझ आती है पर लोकतंत्र में आन्दोलन जो जनता की शक्ति मानी जाती है अगर यह भी बिचौलिए के मोहताज हो जाए तो यह मान लेनी चाहिए की अंग्रेजो से आजादी तो मिल गयी परन्तु राजनितिक आजादी मिलनी अभी बाकी है.अन्ना और केजरीवाल के रिश्तो में दरार एवं एक आन्दोलन की दर्दनाक मृत्यु इसी राजनितिक गुलामी के गवाह है? आईना भले ही खुबसुरत और बदसुरत में फर्क नहीं समझ पता परन्तु हर आईना पीछे से सदैब कोरा ही होता है.प्रतिनिधि लोकतंत्र  प्रणाली में चुनाव का ही महत्व है.जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि ही जनता के लिए क़ानून बनाते हैं और संवैधानिक व्यवस्थाओं का क्रियान्वित करने का कार्य करते हैं.2014 के चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है और यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि प्रतिनिधि लोकतंत्र में चुनाव रुपी आईना इस बार मुखौटो और असली चेहरों में फर्क समझ पाती है या नहीं?

Saturday, September 22, 2012

मैन बनाम मैम-पार्ट-II

टी-२० डीजल,LPG और FDI ट्राफी,Man बनाम Mam के खिताबी मुकाबले की दुसरी पारी में आपका स्वागत है.INDIA इडेन गार्डेन स्टेडियम लगभग १२१ करोड़ दर्शको से खचा खच भरा हुआ है और इनका उत्साह देखते नहीं बन रहा है.अपनी अपनी टीम का हौसला अफजाई करने के लिए कोई अपने सर पर LPG गैस सिलिंडर का टैटू,कोई FDI का बैनर तो कोई पेट्रोल पम्प मुद्रित छवि वाला टोपी पहन रखा है.पुलिंग M के खिलाड़ी मैदान में पहुच चुके है और उधर स्त्रीलिंग M के ओपनर्स भी क्रीज़ की तरफ जाते हुए दिखाई दे रहें है.अम्पायर ने अब खेल शुरू करने का इशारा कर दिया है और पुलिंग M के गेंदबाज राईट आर्म राउंड दी विकेट..दुसरी पारी की पहली गेंद..बिलकुल ब्लॉक होल्ड में...स्त्रीलिंग M के बल्लेबाज बड़ी मुश्किल से इस गेंद को रोकने में कामयाब...चेट्टियार घराने से ताल्लुक रखने वाले तमिलनाडु के इस गेंदबाज की ब्लॉक होल्ड ही खासियत है.. किसी भी बल्लेबाज को अपनी सटीक योर्कर से मुश्किल में डाल सकता है...उधर अम्पायर ने ओवर समाप्ति का इशारा किया...बहुत उम्दा गेंदबाजी...मेडन ओवर कोई रन नहीं...कप्तान ने अपने दुसरे सबसे सक्षम गेंदबाज जो फर्रुखाबाद का है से बातचीत करते हुए..माध्यम गति का गेंदबाज है पर इसकी खासियत यह है की यह बीच बीच में बहुत अच्छी गति परिवर्तन करता है जो की ट्वेंटी-ट्वेंटी में विकेट निकालने के लिए एक कारगर हथियार है...अम्पायर द्वारा ओवर शुरू करने का इशारा..कॉमन मैन एंड से फर्रुखाबाद का गेंदबाज रन अप पे दौड़ लगाते हुए ये पहली गेंद ऑफ साइड से थोडा बाहर जिसको बल्लेबाज ने कट किया,पर सेकंड स्लिप पे बहुत अच्छी फील्डिंग..कोई रन नहीं..आज पुलिंग M ने जो फिल्ड सेटिंग किया है उसकी दाद देनी होगी...ठीक बौलर्स की योग्यता की मुताबिक़....अब गेंदबाज दूसरी गेंद के लिए रन अप पे दौड़ लगाते हुए...ये गेंद थोड़ी सी लेग साइड से बाहर जिसको बल्लेबाज ने मोड़ दिया है,मिड ऑन के फिल्डर गेंद के पीछे भाग रहे रहे..बल्लेबाज दो रन पूरा कर चुके है,तीसरे रन के लिए भागते हुए...बाउंड्री से एक अच्छा थ्रो पर तब तक बल्लेबाज ने तीन रन पूरा कर लिया...अच्छा एवं कांफिडेंट ड्राइव...जैसा की आप देख सकते आज कई नामी गिरामी हस्तियाँ भी इस मैच को देखने के लिए आयें है.ये जो लाल रंग के शर्ट में दिख रहे है कॉमन मैन पार्टी ऑफ़ इंडिया के प्रवक्ता है...वो जो दायीं तरफ VIP बॉक्स में दिख रहे है,ये अन सोसल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष है...दर्शको के साथ FDI का बैनर लेकर आक्रोश प्रदर्शित करते हुए... कमेन्ट्री बॉक्स से ये पता लगाना बड़ा मुस्किल है की ये FDI के तरफ है या जनता के तरफ...ओवर समाप्ति का इशारा...स्त्रीलिंग M दो ओवर की समाप्ति पर ४ रन बिना कोई नुकसान के...पुलिंग M की कसी हुई गेंदबाजी एवं अच्छी फील्डिंग ने स्त्रीलिंग M को खुल कर खेलने नहीं दिया है...पुलिंग M के कप्तान गेंदबाजी में थोडा परिवर्तन करते हुए...स्पिन गेंदबाज का इस्तेमाल करने का फैसला किया है...टी-२० के शरुआती ओवर में स्पिन का इस्तेमाल,काफी बोल्ड डिसीजन माना जायेगा..खैर जालंधर का ये गेंदबाज दूसरा फेकने में उस्ताद है..अपनी फिरकी के जाल में बड़े बड़े खिलाडियों  को फंसा सकता है...वैसे आज कल इसकी फॉर्म थोड़ी लड़खड़ाई हुई है...लेकिन इस तरह के फॉर्मेट में कब कौन अच्छा कर जाए,कोई नहीं जानता..अम्पायर का ओवर शुरू करने का इशारा राईट आर्म ओवर द विकेट... पहली गेंद थोड़ी तेज गति की गूगली..बैट्समन ने रक्षात्मक तरीके से खेला...कोई रन नहीं...अभी आपने जो नारंगी रंग के साड़ी में जिनको देखा.वो भारतीय देखता पार्टी के सदन में मुख्य नेता है...आप देख सकते है...पेट्रोल पम्प मुद्रित छवि वाला टोपी पहन मैच का लुत्फ़ उठा रहे है...क्षमा कीजियेगा कमेंटेटर के लिए ये बताना बहुत मुस्किल हो रहा है की ये इस मुकाबले में क्या कर रही है...पर अंदाज यही लगाया जा सकता है...नैया डूबे किस भी टीम की दफ्तर में लड्डू बटवाऊं मैं,जश्न मनाऊं मै...तीसरे ओवर की आखरी गेंद..ऑफ स्टंप पर..बल्लेबाज ने सीधे कीपर के लिए छोड़ दिया...मेडन ओवर कोई रन नहीं...चौथा ओवर..फिर गेंदबाजी में परिवर्तन...इस बार सोलापुर में जन्मे एक दलित गेंदबाज के हाथ में गेंद दी गयी है..ये राजनीती के खेल के बड़े अनुभवी खिलाडी है...पर गेंदबाजी से ज्यादा बल्लेबाजी में सफल रहे है लेकिन सफलता मिले या न मिले,कप्तान पुलिंग M हमेशा नए नए प्रयोगों के लिए मशहूर रहे है....चौथा ओवर गेंदबाज गेंद डालते हुए...गेंद सीधे जाकर पैड पे टकराई..LBW की अपील पर अम्पायर ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई...उधर दर्शकों में काफी आक्रोश है...धीमी बल्लेबाजी के कारण उनको ऐसा लग रहा है की जैसे टी-२० नहीं टेस्ट मैच देख रहे हो.स्टेडियम में दर्शक आपस में उलझते हुए देखे जा सकते है...सुरक्षाकर्मी बार बार शांत होने के लिए घोषणा कर रहे है...शोर शराबे के कारण अम्पायर ने भी खेल थोड़ी देर के लिए रोक दिया है...अभी आपने नीली लिबास में जिस महाशया को देखा वो विफल समाज पार्टी की मुखिया है...बहुत संघर्ष कर खेल का इतना ऊँचा मकाम हासिल किया है...ये बिलकुल शांत दिख रहे है...इसी वर्ष खेल में मिली करारी हार से निराश ये कुछ समझ नहीं पा रही है...आजकल गरीबी और महंगाई से ज्यादा आरक्षण पर संवेदनशील रहती है...खैर ख़ुशी की बात यह है अम्पायर ने खेल शुरू करने का निर्णय लिया है....चौथे ओवर की अगली गेंद... फुल टॉस...बल्लेबाज ने उछाल दिया है लेकिन वहाँ कोई फिल्डर मौजूद नहीं...जोखिम हो सकता था लेकिन बल्लेबाज के खाते में एक रन का इजाफा...इतनी सारी नामी गिरामी हस्तियों की मौजूदगी से आप अंदाजा लगा सकते हैं की हमारे देश में भारतीय राजनीती की  अंतर्देशीय टी-२० प्रतियोगिता की लोकप्रियता कितनी है...जनहित से ज्यादा व्यक्तिगत लाभ महत्वपूर्ण है...किसी भी खेल में फायदा सिर्फ खिलाडियों का ही होता है,दर्शको के लिए खेल तो मात्र मनोरंजन है...ठीक इसी तरह राजनीती की इस टी-२० प्रतियोगिता से महसूस किया जा सकता है की राजनीती के इस खेल में फायदा सिर्फ नेतागण का ही है,आम आदमी/जनता और इससे जुड़े जन कल्याण की बातें तो सिर्फ इनके लिए मनोरंजन है... चौथे ओवर की समाप्ति पर स्त्रीलिंग M का स्कोर ४ ओवर की समाप्ति पर पांच रन...पुलिंग M के कप्तान ने फर्रुखाबाद के गेंदबाज को गेंदबाजी के लिए बापस बुलाया है...पुलिंग M के कप्तान गेंदबाजी में लगातार परिवर्तन कर बल्लेबाजों को पैर जमाने का बिल्कुल ही मौका नहीं दे रहे है. पांचवा ओवर...पहली गेंद...मिडल और ऑफ स्टंप के बीच..बल्लेबाज ने रक्षात्मक तरीके से खेला कोई रन नहीं...यहाँ  एक बात और गौर करने  है की स्त्रीलिंग M के बल्लेबाज धीमा खेलने के बाबजूद रन रेट बढाने की कोई कोशिश नहीं कर रहे है...पता नहीं स्त्रीलिंग M की क्या रणनीति है...पांचवे ओवर की भी समाप्ति की घोषणा..मेडन ओवर के साथ स्त्रीलिंग M का स्कोर ५ ओवर की समाप्ति पर पांच रन...दर्शक एक बार फिर से शोर शराबा करते दिखाई दे रहे है...स्त्रीलिंग M के बल्लेबाजों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रही है... दर्शक तो हतोत्साह होंगे ही...आयोजक एक बार फिर दर्शको को शांत करने के प्रयास में जुट गए हैं...इसी बीच छठे ओवर के लिए तमिलनाडु के तेज तर्रार गेंदबाज को दुबारा बुलाया गया है...लगता है पुलिंग M POWER PLAY को पूरी तरह से प्रभावहीन कर देना चाहते है...इसी बीच छठे ओवर की आखरी गेंद.. बल्लेबाज ने खेल दिया है कवर की दिशा में,एक रन पुरा कर लिया वही दुरी तरफ दर्शको ने फिल्डर पर पानी और कोल्ड ड्रिंक की बोतलें फेकना शुरू  कर दिया है...अम्पायर ने फिलहाल खेल रोक दिया है...हालात को देखते हुए सुरक्षा  के लिहाज से खिलाडियों  को पवेलियन वापस भेजा जा रहा है...दर्शको  के कुछ समूह ने स्टेडियम में आग भी लगा दिया है...आयोजक और सुरक्षाकर्मी दर्शको को काबू करने की कोशिश में लगें है...पर लगता नहीं है की ये मुकाबला दुबारा शुरू हो पायेगा...स्त्रीलिंग M का स्कोर ६ ओवर में ६ रन को देखते हुए निश्चित तौर पर पुलिंग M का पलड़ा भरी दिख रहा है...अभी अभी आयोजको की तरफ से ये सुचना आई है इस बिगड़े हालात के मद्धेनजर इस मुकाबले का परिणाम सुरक्षित रख लिया गया है...हमेशा ही दर्शक रुपी जनता के पैसे और भावना का यही हश्र होता आ रहा है...और इस मुकाबले में भी जनता और देश के राजस्व का करोड़ो का नुकसान हुआ परन्तु डीजल,LPG और FDI ट्राफी के धुन के आगे जनता का दर्द दिखाई दे तब ना? अर्थशास्त्र एवं अर्थ में जद्दो जहद के बीच देशहित और जनहित को कभी इतना अघात नहीं पंहुचा होगा जितना की इस  डीजल,LPG और FDI ट्राफी में पंहुचा है... स्त्रीलिंग M को पहली बार उनकी राज्य में गिरते जनविश्वास का एहसास हुआ..अच्छी बात है...लेकिन संसद को कमजोर कर और देश को मध्यावधि चुनाव की तरफ धकेलते हुए,क्या यह एक जनहित से जुडी निर्णय मानी जायेगी?...किसी भी राज्य की जनता क्या देश की जनता नहीं है? राज्य सर्वोपरि है या देश? अपने लाभ के लिए प्रांतवादी राजनीती करनी छोड़ दे हमारे नेतागण?...ये राज्यहित के लिए संसद की बेइज्जती नहीं तो और क्या है?...सब्सिडी से गरीबों को राहत तो महसूस हो सकती है लेकिन गरीबी कम या ख़त्म नहीं हो सकती? अगर सब्सिडी से गरीबी कम या खत्म हो सकती थी तो ६५ वर्ष से लगातार मिल रही सब्सिडी से गरीबी अब गरीब नहीं होनी चाहिए थी?

Thursday, September 20, 2012

सम्बन्ध विच्छेद

टीम अन्ना में अब अन्ना शब्द नहीं रहा.भ्रष्टाचार का आन्दोलन अब दो भागों में खंडित हो गया है.अन्ना अब अलग रस्ते चलेंगे वही केजरीवाल और उनकी फ़ौज अन्ना को दिल में रख अब आन्दोलन को राजनितिक मुखौटा पहना एक नयी ध्वनि और रूप में पेश करेंगे.कृष्ण और अर्जुन अलग हो जायेंगे तो फिर गीता कहाँ से रची जायेगी.धर्म और अधर्म की लड़ाई में भगवान् श्री कृष्ण को भी जीत और हार की निर्णायक प्रणाली युद्ध का ही मार्ग अख्तियार करना पड़ा था वह भी अर्जुन का सारथी बनकर.आगे रहकर टीम का नेतृत्व करना...परफेक्ट टीम वर्क.
हमारी देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संसद ही सर्वोच्च संस्था है,इसको दरकिनार कर सामानांतर रूप से जन जागृति का कार्य तो कर सकते है लेकिन संसद का हिस्सा बने बिना कुछ नहीं कर सकते.अन्ना हजारे जी की सोच और उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट है और हम इस विषय में कोई प्रश्न नहीं उठा रहे है किन्तु उनका राजनीती से दूर रह व्यवस्था में परिवर्तन का सिद्धांत भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली में कभी कारगर नहीं हो सकती..और अगर आप ऐसा सोचते है तो तत्कालीन व्यवस्था के समरूप एक अलग व्यवस्था बनाना होगा जो की देश के संबिधान की तौहीन होगी.किसी भी देश में दो संविधान संभव है क्या? राजनीती में परिवर्तन सिर्फ राजनीती ही कर सकती है, इसका और कोई विकल्प है ही नहीं.व्यवस्था की खामियां और उसका समाधान व्यवस्था का हिस्सा बन कर ही अच्छी तरह से समझा जा सकता है.केजरीवाल और उनकी सेना बिलकुल सही दिशा पे चलने का निर्णय लिया है और अगर अब उनकी एकता और मंशा दिग्भ्रमित नहीं हुई तो निश्चित रूप से हमारी देश की संसदीय प्रणाली उनका सहयोग करेगी और वो अपने मकसद के अनुसार देश और जनता के लिए फलदायक कार्य करने में कामयाब हो पायेंगे.
अन्ना का टीम अरविन्द केजरीवाल से सम्बन्ध विच्छेद से सबसे ज्यादा दुःख पिछले दो वर्षो में भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन को मिली सकारात्मक उर्जा को हुई होगी और यह अन्ना के उत्साह के साथ साथ टीम अरविन्द केजरीवाल को भी नुकसान पहुचाने वाला है.खैर बिना कृष्ण के महाभारत संभव नहीं थी ठीक उसी तरह बिना अर्जुन के युद्ध के सिद्धांतों को व्यावहारिकता में परिणत भी संभव नहीं था.लेकिन महाभारत अब भारत हो गया है तो क्रांति का स्तर महान कैसे हो सकता.श्री कृष्ण प्रकांड विद्वान् के साथ साथ एक अलौकिक शक्ति के अवतार भी थे.योद्धा की शक्ति,गुणवत्ता और समर्पण उनसे अच्छा इस संसार में कोई भी परख नहीं सकता.लेकिन आज के परिवेश में न तो धर्म और अधर्म की विशुध्ता रह गयी है और ना ही युद्ध के रथ की सारथी और उसमें विराजमान योद्धाओं की भावनाओं की,फिर क्रांति के मशाल की आभा तो प्रभावित होगी ही.भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन अब अंदरूनी कलह से संक्रमित हो चुका है और अगर इस संक्रमण से निजात पाना है तो पहले एक ठोस मंच तैयार करना होगा ताकि लोगो को यह विश्वाश हो सके की यह सकारात्मक आन्दोलन है और तभी लोग इसे जनांदोलन का रूप दे सकेंगे.महाभारत और भगवत गीता दोनों की साख पे बट्टा लगा है और इसकी मर्यादा की हिफाजत की जिम्मेदारी अब टीम केजरीवाल को निभानी होगी वर्ना लोकतंत्र में आन्दोलन का अधिकार और इसकी परिकल्पना सिर्फ तमाशा बनकर रह जायेगी..???