Saturday, July 7, 2012

सामाजिक प्राणी,सामंजस्य और सोसल नेटवर्किंग मीडिया ???

सामाजिक प्राणियों वाला समाज मुख्यतः सामंजस्य से चलता है, ध्यान रहे ऐसा मैं नहीं वल्कि इस धरातल के बहुत सारे समाज शास्त्र के अनुयायी कहा करते है.साल के लगभग हर दिन उत्सव मनाने वाला चिर प्राचीन दमित,विक्षिप्त  भारतीय समाज,समुदाय आज सोसल नेटवर्किंग मीडिया को सामंजस्य का न्याधार मान रखा है.शायद यह सामंजस्य के लिए सरल और आर्थिक रूप से पैसा न के बराबर खर्च होने के वजह से लोकप्रिय भी है.फेसबुक पे भावनाओ की अभिव्यक्ति,गुड मोर्निंग,गुड नाइट,हैप्पी बर्थडे,हैप्पी एनिवर्सरी इत्यादि और ज्ञान दान का 24x7 सिलसिला भारतीय सुसंस्कृत समाज को सामंजस्य के लिए  इससे सस्ता और कोई नहीं सा फ़ॉर्मूला सिद्ध हो गया है.शौर्यता और अतिविशिष्टता प्रदर्शित करने को आतुर हमारा समाज,तजुर्बात-ए-जिंदगी के मुताबिक फेसबुक के नुमाइंदगी वाली सामंजस्य की ये परिभाषा अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना मात्र जैसा ही है.जो समाज अपने जन्मदाता माँ ,बाप से सामंजस्य नहीं बिठा सकता शायद वैसे ही समाज को  सोसल होने के लिए मीडिया की जरूरत होती है.आंकड़ो को माने तो हमारे देश में पिछले दस वर्षो में वृद्धाश्रम की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है और यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है की हमारा सुसंस्कृत भारतीय समाज कितना सोसल है?God's Own Country से संबोधित किया जाने वाला राज्य केरल में सर्वाधिक लगभग १४० वृद्धाश्रम हैं.आइये एक नज़र निम्नलिखित राज्यवार अनुमानित वृद्धाश्रम आंकड़ो पे डालते है.

१/ केरल -
लगभग १४०
२/
कोलकाता - लगभग ३४
३/ हरयाणा -
लगभग २४
४/ उत्तर प्रदेश -
लगभग २२
५/ गुजरात -
लगभग १८
६/ पंजाब -
लगभग १६
७/ आंध्र प्रदेश -
लगभग १४
८ / महारास्ट्र -
लगभग १६(मुंबई-लगभग १०)
९/ तमिलनाडु -
लगभग १०
१०/ उत्तराँचल -लगभग १०
११/ हिमाचल प्रदेश -
लगभग ०७
१२/ कर्नाटक -
लगभग ०६
१३/ दिल्ली -
लगभग
०५

जैसा की  हम सभी जानते है विकसित होने के सारे मापदंडो पर
उपर्युक्त राज्य सरकारी आंकड़ो के गोल्ड क्लब में शुमार है फिर भी सामंजस्य न हो पाना सामाजिक दिवालियापन नहीं तो और क्या है? अगर हम माँ, बाप के साथ सोसल नहीं हो सकते तो हम किसी के साथ और कभी भी सोसल नहीं हो सकते? सोसल शब्द को सोसल होकर सोचने की जरूरत है ना की फेसबुक बनकर ??? सरकार को इस बाबत कोसना, बेशर्मियत की कोई तो हद होती है..शायद अनगिनत सरकारी वित्तपोषित एनजीओ द्वारा वृद्धाश्रम का फलता फूलता मूर्ख व्यावसायीकरण फेसबुक को इंडिया ओल्डएज बुक,एक अतिरिक्त सोसल नेटवर्किंग प्लेटफोर्म बनाने को प्रेरित जरूर करनी चाहिए और फिर हम इसे टेक्नोलोजी युग  की बानगी मानकर फुले नहीं समायेंगे.

क्या सोसल होने के लिए मीडिया की जरूरत है?फेसबुक इस्तेमाल कीजिये पर सामंजस्य एवं सोसल शब्द सिर्फ इसके बिजनेस मॉडल तक ही सिमित रखे वर्ना सोसल और मनोरंजन दोनो का अर्थ एक सा ज्ञात होने लगेगा.सामाजिक प्राणियों द्वारा दैवीय कण/परमात्मा के समीप पहुचने का दावे करने वाले इस ऐतिहासिक युग में भी सोसल होने के लिए मीडिया की जरूरत आन पड़ी तो पता नहीं जीवन में नेटवर्किंग मीडिया की और कहाँ कहाँ जरूरत पड़ेगी..:-)

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